फर्रुखाबाद :का हक कब तक छीना जाएगा? विकास परियोजनाओं से लगातार वंचित होता जनपद

फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 04 जून 2026 ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जनपद फर्रुखाबाद पिछले कई वर्षों से विकास परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं में लगातार उपेक्षा का शिकार होता दिखाई दे रहा है। जनपद के लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि प्रदेश और केंद्र सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाएं फर्रुखाबाद के हिस्से से निकलकर दूसरे जिलों की झोली में चली जाती हैं, जबकि यहां के जनप्रतिनिधि हर बार मौन नजर आते हैं।

गंगा एक्सप्रेसवे से शुरुआत हुई नाराजगी

फर्रुखाबादवासियों की सबसे बड़ी नाराजगी गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना को लेकर रही। लोगों को उम्मीद थी कि यह महत्वाकांक्षी परियोजना जिले के विकास की नई राह खोलेगी, लेकिन एक्सप्रेसवे का मार्ग फर्रुखाबाद से दूर चला गया। उस समय विभिन्न स्तरों पर कई तर्क दिए गए, जिनमें जिले की भौगोलिक और तकनीकी परिस्थितियों का हवाला भी शामिल था। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक नारा खूब चर्चा में रहा— “फर्रुखाबाद चूसे गन्ना, एक्सप्रेसवे ले गए खन्ना।” यह नारा जिले की जनता की नाराजगी का प्रतीक बन गया।

ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे भी नहीं पहुंचा फर्रुखाबाद

गंगा एक्सप्रेसवे के बाद ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे से भी लोगों को उम्मीद थी, लेकिन यह परियोजना भी जिले के हिस्से नहीं आई। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि ये परियोजनाएं जिले से होकर गुजरतीं तो व्यापार, उद्योग और रोजगार के नए अवसर पैदा होते।

टेक्सटाइल पार्क का सपना भी टूटा

फर्रुखाबाद की पहचान कभी अपने प्रसिद्ध टेक्सटाइल और प्रिंटिंग उद्योग के लिए पूरे देश में थी। यहां के वस्त्र उद्योग ने हजारों परिवारों को रोजगार दिया। लेकिन जब आधुनिक टेक्सटाइल पार्क की स्थापना की बात आई तो यह परियोजना हरदोई जिले को मिल गई। विशेषज्ञों के अनुसार इससे लगभग 10 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना थी। स्थानीय उद्योग जगत का मानना है कि यह अवसर फर्रुखाबाद के लिए अधिक उपयुक्त था।

संकिसा में विश्वविद्यालय की उम्मीद भी अधूरी

विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थस्थल संकिसा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए पाली विश्वविद्यालय की स्थापना की चर्चा लंबे समय तक होती रही। बताया गया कि इसके लिए फंड भी उपलब्ध हुआ, लेकिन बाद में यह परियोजना दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित हो गई। इससे जिले के लोगों में निराशा और बढ़ी।

ढाई घाट मेला और पारंपरिक पहचान पर संकट

फर्रुखाबाद की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा ढाई घाट मेला भी अब जिले की पहचान के रूप में कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी वह महत्व नहीं मिल रहा जिसकी वह हकदार है।

कारचोभ उद्योग भी अंतिम सांसों पर

एक समय फर्रुखाबाद में कारचोभ और हस्तशिल्प उद्योग सैकड़ों परिवारों की आजीविका का साधन था। लेकिन सरकारी संरक्षण और आधुनिक बाजार से जुड़ाव के अभाव में यह उद्योग धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। स्थानीय कारीगरों का कहना है कि यदि समय रहते उचित योजनाएं लागू नहीं की गईं तो यह विरासत पूरी तरह खत्म हो सकती है।

अब कालिंद्री एक्सप्रेस पर भी संकट

फर्रुखाबाद को सीधे राजधानी दिल्ली से जोड़ने वाली प्रमुख रेल सेवा कालिंद्री एक्सप्रेस को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। कानपुर-अनवरगंज रेलखंड पर प्रस्तावित एलिवेटेड ट्रैक निर्माण के चलते ट्रेन सेवा लंबे समय तक प्रभावित रहने की संभावना जताई जा रही है। लोगों को आशंका है कि यदि वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई गई तो जिले की रेल कनेक्टिविटी को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

जनता पूछ रही है सवाल

लगातार विकास परियोजनाओं से वंचित होने के बाद अब जिले के लोग अपने जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिले के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी प्रयास दिखाई नहीं देते। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर फर्रुखाबाद को उसका हिस्सा दिलाने के लिए क्या कदम उठाए गए और भविष्य में क्या रणनीति बनाई जाएगी।

एकजुट आवाज की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जिले का विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जनता, जनप्रतिनिधियों, व्यापारिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं की सामूहिक आवाज से संभव होता है। फर्रुखाबाद के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती अपने विकास अधिकारों को लेकर संगठित और प्रभावी पहल करने की है।

फर्रुखाबाद का इतिहास गौरवशाली रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि जिले के विकास, रोजगार, उद्योग, शिक्षा और परिवहन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता के साथ उठाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अवसरों की तलाश में अपना जनपद छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े।

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