Tuesday, 27 October 2026 | 10:50 PM
संपादकीय

चौदह असहमतियाँ, एक सर्वसम्मति: लोकतंत्र का नया गणित

यह राजनीतिक व्यंग्य लोकतंत्र में सर्वसम्मति के दावों और असहमति की वास्तविक भूमिका पर सवाल उठाता है। निर्वाचन आयोग के हलफ़नामे में सर्वसम्मति के दावे को केंद्र में रखकर लेख चुनावी प्रक्रिया, संस्थागत पारदर्शिता, कर्मचारियों की छँटनी, अधिकारियों के राजनीति में प्रवेश और विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी ख़बरों पर व्यंग्य करता है। लेख का मूल तर्क है कि लोकतंत्र की ताक़त सबका एकमत होना नहीं, बल्कि असहमति को जगह देना, उसे दर्ज करना और उसका सम्मान करना है।
Share:
चौदह असहमतियाँ, एक सर्वसम्मति: लोकतंत्र का नया गणित
आज देश में सर्वसम्मति लौट आई है। मैंने सुबह का अख़बार पढ़ा, और आपको बताना चाहता हूँ कि यह कितनी ख़ूबसूरत चीज़ है। शुरुआत वहीं से, जहाँ सर्वसम्मति की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। निर्वाचन आयोग ने कल सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा दिया कि मतदाता-सूची के पुनरीक्षण पर उसके सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए हैं, और फ़ॉर्म छह में कोई बदलाव नहीं किया गया। मैं यह पढ़कर इतना प्रसन्न हुआ कि पिछले हफ़्ते की कुछ चीज़ें भूलने की कोशिश करने लगा। जैसे वह चिट्ठी जो दो आयुक्तों ने अपने मुखिया को छोड़कर कैबिनेट सचिव को लिखी थी, और जिसके चौदह पन्ने अट्ठाईस रुपये पर रुके हैं। जैसे इंडियन एक्सप्रेस की वह गिनती कि उन्हीं दो आयुक्तों ने नौ महीनों में चौदह बार लिखित असहमति दर्ज की। जैसे वह "घोषणा-पत्र" जो फ़ॉर्म छह के साथ नत्थी हुआ और जिसे आयोग के अपने दो सदस्यों ने "अवैध और अनधिकृत" कहा। जैसे मुख्य न्यायाधीश का यह कहना कि संशोधित फ़ॉर्म छह को हमने कभी मंज़ूर नहीं किया। यह सब मैं भूलने की कोशिश कर रहा हूँ, क्योंकि अब हलफ़नामा आ गया है और हलफ़नामे में सर्वसम्मति है। चौदह असहमतियाँ और एक सर्वसम्मति, दोनों एक साथ सच हो सकती हैं, बशर्ते आप आयोग में काम करते हों। पर यह सर्वसम्मति सिर्फ़ आयोग तक सीमित नहीं है। आज का पूरा अख़बार इसी भावना से भरा है। लखनऊ में कल रात एक टैंकर पलटा और फ़ॉर्मेल्डिहाइड सड़क पर फैल गया। बारह हज़ार लोगों को साँस लेने में तकलीफ़ हुई। बारह हज़ार लोग, एक ही रात, एक ही राय: साँस नहीं आ रही। इसे कहते हैं सर्वसम्मति। टैंकर चालक की राय इसमें शामिल नहीं है, वह भाग गया। ख़बर है कि माइक्रोसॉफ़्ट ने साठ हज़ार कर्मचारियों को "स्वेच्छा से नौकरी छोड़ने का विकल्प" दिया है। स्वेच्छा से। यानी साठ हज़ार लोग एक साथ स्वेच्छा दिखाएँगे। मुझे नहीं पता इतनी स्वेच्छा दुनिया में एक साथ कभी देखी गई है। आज पता चला कि "विकल्प" शब्द का अर्थ भी समय के साथ बदल जाता है, जैसे "सर्वसम्मति" का। अमर उजाला की एक सुर्ख़ी है: अफ़सर से माननीय बनने की होड़। सेवा से रिटायर होते ही विधायक-सांसद बनने की क़तार लंबी हो रही है। यहाँ भी सर्वसम्मति है। जिन्होंने तीस साल नेताओं की फ़ाइलें निपटाईं, वे सब एकमत हैं कि असली आनंद फ़ाइल भेजने में है, निपटाने में नहीं। दिल्ली के व्यापारी एकमत हैं कि विपक्ष की "वोट चोरी" रैली से उनका धंधा चौपट होगा। विपक्ष के नेता ने शर्त रखी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटा दो, आंदोलन तीस सेकंड में रुक जाएगा। तीस सेकंड। इस देश में एक फ़ाइल तीस सेकंड में नहीं हिलती, पर आंदोलन हिल सकता है, यह दावा भी अपने आप में सर्वसम्मति योग्य है। और आज चार राज्यों में विधान परिषद के नतीजे आ रहे हैं, जहाँ सिर्फ़ स्नातक और शिक्षक वोट देते हैं। आगरा में छह कर्मचारी इसी चुनाव में लापरवाही पर निलंबित हुए। पढ़े-लिखों के चुनाव में भी निलंबन, इस पर पूरा देश सहमत हो सकता है कि यह आश्चर्य की बात नहीं है। अब एक ख़बर जो इस सूची में फिट नहीं बैठती, इसलिए अलग से। आज इज़राइल में आम चुनाव है। तिहत्तर लाख मतदाता, बारह हज़ार अठारह बूथ। वहाँ कोई सर्वसम्मति नहीं है। प्रधानमंत्री को पता नहीं कि वह शाम तक प्रधानमंत्री रहेंगे या नहीं। सड़क पर लोग लड़ रहे हैं, टीवी पर लोग लड़ रहे हैं, पार्टियाँ टूट रही हैं और बन रही हैं। कितना अशांत देश है। वहाँ कोई हलफ़नामा नहीं देता कि सब फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए। वहाँ असहमति को छिपाया नहीं जाता, गिना जाता है। और यहीं व्यंग्य ख़त्म। लोकतंत्र का सबसे सच्चा प्रमाण असहमति है। जिस संस्था में तीन लोग बैठे हों और चौदह बार दो लोग अलग राय लिखें, वह संस्था ज़िंदा है। जिस संस्था के हलफ़नामे में वे चौदह असहमतियाँ ग़ायब हों और "सर्वसम्मति" लिखा हो, वह संस्था ज़िंदा दिखने की कोशिश कर रही है। सर्वसम्मति लोकतंत्र में प्राप्त की जाती है, घोषित नहीं की जाती। घोषित सर्वसम्मति का दूसरा नाम आप जानते हैं। मैं नहीं लिखूँगा। बाबासाहेब ने कहा था कि जहाँ असहमति की जगह न बचे, वहाँ संविधान काग़ज़ रह जाता है। सहमति तभी पवित्र है जब वह विवेक से आए, दबाव से नहीं। आज रात सोने से पहले एक छोटा काम। अपने घर में किसी एक बात पर खुलकर असहमत होइए। बहस कीजिए, बिना किसी के साँस रोके। लोकतंत्र का अभ्यास रसोई से शुरू होता है। और कल सुबह मुझे बताइए कि आपके घर में सर्वसम्मति किसकी चलती है।