उस शरद ऋतु में भारत की राजधानी ने एक अजीब दृश्य देखा। देश के सबसे पढ़े-लिखे युवा सड़कों पर थे, और उनकी माँग न नौकरी थी, न आरक्षण, न फ़ीस। उनकी माँग थी कि मतदाता सूची से हटाए गए तेरह करोड़ नामों का हिसाब दिया जाए। इतिहासकार इसे "गिनती का आंदोलन" कहते हैं, क्योंकि पहली बार किसी लोकतंत्र में नागरिक यह साबित करने सड़क पर उतरे कि वे मौजूद हैं।
आंदोलन का नेतृत्व एक सत्ताईस वर्षीय युवक कर रहा था, जिसके संगठन का नाम उस अपमान से बना था जो देश के एक उच्च पदाधिकारी ने बेरोज़गार युवाओं को दिया था। छात्रों ने उस अपमान को अपनी पहचान बना लिया। यह इतिहास की एक पुरानी परंपरा थी, जिसे "अपमान का उलटाव" कहते हैं। (देखें: बॉक्स 14.2, "सैंस-क्यूलॉत से कॉकरोच तक")

भविष्य की राजनीति विज्ञान की किताब, भारतीय संसद, मतदाता सूची और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते नागरिकों का प्रतीकात्मक दृश्य।
राज्य की प्रतिक्रिया इस पाठ का सबसे अधिक अध्ययन किया गया हिस्सा है। उस युवक को एक बार हवाई जहाज़ से उतारा गया और एक बार अपने घर से उठाया गया। छह दिन में दो बार उससे लिखवाया गया कि वह एक वर्ष तक शांति भंग नहीं करेगा। जिस दिन वह हिरासत में था, उसकी दादी का देहांत हुआ और वह चिता तक नहीं पहुँच सका। उस समय की सरकार ने कहा था कि उसे पहुँचाने की पेशकश की गई थी। दस्तावेज़ दोनों पक्षों के बयान दर्ज करते हैं, निष्कर्ष नहीं।
दिल्ली का वह चौराहा, जहाँ तेंतीस वर्षों से देश अपनी शिकायतें कहता था, एक अधिसूचना से प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटा दिया गया। जिस समिति ने यह सिफ़ारिश की, उसका नाम आज तक किसी अभिलेख में नहीं मिला। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने कहा कि समिति अदालत के आदेश से पहले बनी थी, उच्च न्यायालय में पुलिस ने कहा कि अदालत के आदेश के बाद। विद्यार्थी ध्यान दें कि दोनों कथन एक ही सप्ताह के हैं।
इस काल की सबसे चर्चित पंक्ति किसी नेता की नहीं, एक अदालती कार्यवाही की है। केंद्र सरकार के सबसे वरिष्ठ अधिकारी ने अदालत में "बिना शर्त माफ़ी" लिखी और उसी हलफ़नामे में फिर इंटरनेट बंद करने की अनुमति माँगी। जब सरकार के विधि अधिकारी ने कहा कि माफ़ी तो "प्रक्रिया का हिस्सा" है, तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "आपकी इसी दलील से वह सशर्त हो गई।" यह वाक्य बाद में विधि-विद्यालयों में "औपचारिक माफ़ी के सिद्धांत" के उदाहरण के रूप में पढ़ाया गया।
उसी सप्ताह देश के सबसे वरिष्ठ वकील अदालत परिसर में गांधी की प्रतिमा के सामने सफ़ेद रिबन बाँधकर एक मिनट मौन खड़े रहे। और एक शाम, जब आयोजक जेल में थे, पुलिस ने स्वयं अपने चुने हुए कुछ लोगों से राष्ट्रीय ध्वज फहरवाया। इतिहासकार इस घटना को लेकर आज भी बँटे हुए हैं कि यह विरोध का दमन था या विरोध का अधिग्रहण।
पाठ का अंतिम खंड उन लोगों के बारे में है जिनका नाम किसी अख़बार में नहीं छपा। वे तेरह करोड़ नाम। अभिलेख बताते हैं कि उनमें अधिकांश प्रवासी मज़दूर, किरायेदार और झुग्गीवासी थे, यानी वे जिनके लिए राज्य सुविधा नहीं, जीवनरेखा था, और जिनके पास राज्य तक पहुँचने का एकमात्र साधन पाँच वर्ष में एक मत था। आंदोलन के इतिहास में यह विडंबना बार-बार दर्ज हुई कि जो सरकार के बिना जी सकता था, उसका नाम सलामत रहा, और जिसकी साँस सरकार से बँधी थी, उसका नाम कटा।
इस आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, यह अगले पाठ में है।
अभ्यास प्रश्न
1. "राज्य नागरिक से वचन लेता है, स्वयं कोई वचन नहीं देता।" अक्टूबर 2026 के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए। (10 अंक)
2. उस समय के एक साधारण नागरिक की भूमिका में, जिसने न प्रदर्शन किया न विरोध, एक डायरी-प्रविष्टि लिखिए कि उसने उस सप्ताह क्या किया। (5 अंक)
3. आपके अपने परिवार में क्या कोई ऐसा व्यक्ति था जिसका नाम 2026 की सूची से हटा था? उससे पूछिए कि उसे कब पता चला। (परियोजना कार्य)
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यह पाठ आज से पचास साल बाद की किताब का है। वह किताब अभी लिखी नहीं गई। उसका तीसरा प्रश्न, परियोजना कार्य, आज पूरा किया जा सकता है। अपने घर में, अपने मुहल्ले में, किसी ऐसे व्यक्ति से पूछिए जो ख़ुद सूची नहीं देख सकता। क्योंकि 2076 की किताब में अगला पाठ कैसा होगा, यह इस बात से तय होगा कि 2026 में कितने लोगों ने यह सवाल पूछा।