एक सवाल जो इस पूरे हफ़्ते किसी ने नहीं पूछा। वोट आख़िर है किसके लिए?
जिसके पास बंगला है, वकीलों की फ़ौज है, मंत्री का फ़ोन नंबर है, उसे वोट की ज़रूरत कितनी है? सरकार कोई भी हो, उसका काम चलता है। फ़ाइल रुकती है तो कोई फ़ोन घुमा देता है। नोटिस आता है तो कोई वकील सँभाल लेता है। ज़मीन चाहिए तो कोई नीति बदल जाती है। उसके लिए सरकार एक सुविधा है, जैसे घर में लगा एसी। चले तो अच्छा, न चले तो दूसरा इंतज़ाम है।
अब उस औरत को देखिए जो सुबह पाँच बजे उठकर आँगनवाड़ी जाती है, जिसके बेटे की फ़ीस छात्रवृत्ति से भरती है, जिसके पति का इलाज आयुष्मान कार्ड पर टिका है, जिसका राशन उस दुकान से आता है जहाँ अंगूठा लगाना पड़ता है। उसके लिए सरकार सुविधा नहीं है। उसके लिए सरकार साँस है। एक योजना बंद हो तो उसकी रसोई बंद होती है, एक अफ़सर रूठ जाए तो उसका बच्चा स्कूल से बाहर, एक नियम बदले तो उसकी पहचान ही सवाल बन जाती है।
और उसके पास सरकार तक पहुँचने का एक ही रास्ता है। एक काग़ज़ पर उसका नाम, और पाँच साल में एक दिन एक बटन।
बस।
न उसके पास फ़ोन नंबर है, न वकील, न धरना देने की फ़ुर्सत, न हिम्मत। वह सड़क पर नहीं आ सकती क्योंकि एक दिन की दिहाड़ी छूट जाएगी। वह थाने नहीं जा सकती क्योंकि वहाँ उसकी भाषा नहीं समझी जाती। वह अदालत नहीं जा सकती क्योंकि अदालत का रास्ता उसे पता नहीं। वह सिर्फ़ वोट दे सकती है। और वही एक चीज़ उसे यह भरोसा देती है कि जो ऊपर बैठा है, वह पाँच साल में एक बार उसके दरवाज़े तक ज़रूर आएगा, हाथ जोड़कर।
अब सोचिए, उस काग़ज़ से उसका नाम हट जाए तो क्या होगा?
वह दिहाड़ी पर जाती रहेगी, राशन भी शायद मिलता रहेगा, कोई उसे जेल नहीं भेजेगा। पर वह धीरे-धीरे अदृश्य हो जाएगी। क्योंकि नीति बनाने वाला हिसाब लगाता है, और जो गिनती में नहीं है, वह हिसाब में नहीं है। उसकी बस्ती में सड़क देर से आएगी, उसका अस्पताल आख़िरी में बनेगा, उसका बच्चा जिस स्कूल में पढ़ता है वह सबसे पहले बंद होगा। कोई उसके विरुद्ध साज़िश नहीं करेगा। बस कोई उसे याद नहीं रखेगा। लोकतंत्र में सबसे बड़ी सज़ा जेल नहीं है, भुला दिया जाना है।
इसीलिए तेरह करोड़ नाम सिर्फ़ संख्या नहीं हैं। उनमें से हर नाम एक ऐसा आदमी है जिसके पास सरकार तक पहुँचने का वही एक रास्ता था, और अब वह भी बंद होने की कगार पर है। और ध्यान दीजिए कि ये नाम किसके कटे हैं। अधिकतर प्रवासी मज़दूर, झुग्गी वाले, किरायेदार, वे जिनके पास काग़ज़ कम हैं और चिंताएँ ज़्यादा। जिनके पास बंगला है, उनके नाम सलामत हैं। सूची से वही गायब हुआ जिसे सूची की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
यही सबसे क्रूर व्यंग्य है। जो सरकार के बिना जी सकता है, उसका वोट बचा रहा। जिसकी ज़िंदगी सरकार पर टिकी है, उसका वोट खतरे में है।
इस हफ़्ते दिल्ली में तीन प्रश्न पूछे गए। एक लड़के ने पुलिस से पूछा, मुझ पर आरोप क्या है। एक लड़की ने थाने से निकलकर पूछा, किस क़ानून से। और एक वकील ने पूछा, वह है कहाँ। ये तीनों पढ़े-लिखे थे, इन्हें पूछना आता था। उस आँगनवाड़ी वाली औरत को पूछना नहीं आता। उसके हिस्से का प्रश्न यही तीन पूछ रहे थे। और जब इन्हें उठाया जाता है, तो सिर्फ़ इनकी आवाज़ नहीं बंद होती। उसकी भी बंद होती है जो कभी बोली ही नहीं।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य, और चेताया था कि राजनीति में तो हमने यह बराबरी दे दी, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में नहीं। आज डर यह है कि वह राजनीतिक बराबरी भी काग़ज़ से खिसक रही है। उन्हें पता था कि वोट अमीर के लिए एक और हथियार है, पर ग़रीब के लिए अकेला हथियार। जिसके पास एक ही हो, उससे वही छीन लेना किस न्याय का नाम है?
गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कहते थे कि समाज की परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह अपने समर्थों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इससे होती है कि उसकी व्यवस्था में सबसे कमज़ोर आदमी का स्थान कहाँ है। आज वह स्थान एक सूची की एक पंक्ति है। और वह पंक्ति मिट रही है।
इसलिए यह लड़ाई किसी दल की नहीं है। यह उस आदमी की लड़ाई है जो लड़ नहीं सकता। और जो लड़ सकते हैं, उन पर एक क़र्ज़ है, कि वे अपनी आवाज़ में उसकी भी मिलाएँ।
आज बस इतना कीजिए। अपने घर में काम करने वाली, अपने मुहल्ले के चौकीदार, अपने गाँव से शहर आए रिश्तेदार से पूछिए, तुम्हारा नाम सूची में है? अगर उसे पता नहीं है, तो उसके साथ बैठकर देखिए। क्योंकि जिस दिन उसका नाम बचेगा, उस दिन सरकार उसके दरवाज़े आना बंद नहीं कर पाएगी।
और वही लोकतंत्र है। बाक़ी सब इमारतें हैं।