Tuesday, 20 October 2026 | 5:00 AM
संपादकीय

सत्ता के शोर में कहीं दबकर तो नहीं रह गई जनता की पुकार?

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सत्ता के शोर में कहीं दबकर तो नहीं रह गई जनता की पुकार?
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लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकारें बनाने और सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में निहित है कि एक सामान्य नागरिक की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है। लेकिन जब जनता की समस्याएं बार-बार उठाने के बावजूद अनसुनी रह जाएं, सवाल पूछने वालों को संदेह की नजर से देखा जाने लगे और जनहित के मुद्दों पर राजनीतिक लाभ-हानि का गणित हावी हो जाए, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र में आम आदमी की आवाज़ कमजोर पड़ती जा रही है?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां मतदाता सरकार चुनते हैं, जनप्रतिनिधियों को संसद और विधानसभाओं तक पहुंचाते हैं तथा संविधान उन्हें अपने अधिकारों के संरक्षण की गारंटी देता है। इसके बावजूद लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती का आकलन केवल मतदान के प्रतिशत या चुनावी जीत-हार से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं को शासन में कितनी प्राथमिकता मिलती है।

लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। चुनाव के समय यही जनता राजनीतिक दलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। उसके सामने वादों की लंबी सूची रखी जाती है, विकास के सपने दिखाए जाते हैं और बेहतर भविष्य का भरोसा दिया जाता है। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद क्या जनता की समस्याएं भी उतनी ही प्राथमिकता से सुनी जाती हैं?

महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय, छोटे कारोबारियों की मुश्किलें और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं हैं। ये आम नागरिक के जीवन से जुड़े मुद्दे हैं। जब इन पर ठोस और जवाबदेह कार्रवाई के बजाय केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सुनाई देते हैं, तो जनता के मन में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।

हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर जगह जनता की आवाज़ कमजोर हो गई है। अनेक मामलों में नागरिकों, सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और जन आंदोलनों ने सरकारों का ध्यान महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर खींचा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर नागरिक को अपनी बात रखने और उसका जवाब पाने का समान अवसर मिल रहा है?

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, नागरिक का अधिकार है। सत्ता से जवाब मांगना व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे अधिक जवाबदेह बनाना है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आलोचना सुनने और कमियों को स्वीकार करने की क्षमता से भी होना चाहिए।

यदि किसी नागरिक की शिकायत पर कार्रवाई नहीं होती, किसी गरीब की समस्या दफ्तरों के चक्कर काटने के बावजूद हल नहीं होती या किसी जनहित के सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल उठाने वाले की मंशा पर बहस शुरू हो जाती है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही के सामने गंभीर चुनौती है।

असहमति को दुश्मनी समझने की प्रवृत्ति किसी भी लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह हो सकती है। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं, जहां सभी लोग एक जैसी राय रखते हों; मजबूत लोकतंत्र वह है, जहां अलग-अलग विचारों को संवैधानिक मर्यादा के भीतर जगह मिलती हो।

आज सार्वजनिक विमर्श में यह चिंता बार-बार सामने आती है कि जनजीवन से जुड़े कई बुनियादी मुद्दे राजनीतिक टकराव, प्रचार और भावनात्मक बहसों के बीच पीछे छूट जाते हैं। राजनीतिक दलों के बीच मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन जब इन मतभेदों के कारण जनहित के प्रश्नों पर गंभीर चर्चा प्रभावित होती है, तो नुकसान अंततः नागरिकों का होता है।

एक बेरोजगार युवा को रोजगार चाहिए। किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य और समय पर भुगतान चाहिए। मरीज को सुलभ इलाज चाहिए। विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। छोटे व्यापारी को स्थिर और भरोसेमंद कारोबारी माहौल चाहिए। इन जरूरतों का समाधान राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि नीतियों, संसाधनों और प्रभावी क्रियान्वयन से होगा।

लोकतंत्र की कसौटी यही है कि सत्ता की प्राथमिकताओं में आम नागरिक की जरूरतों को कितना स्थान मिलता है। लोकतंत्र में जनता की आवाज़ केवल सरकार की जिम्मेदारी से मजबूत नहीं होती। इसके लिए नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, मीडिया और संस्थाओं—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण हो, जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र के लोगों से नियमित संवाद करें, संसद और विधानसभाओं में जनहित के प्रश्नों पर गंभीर चर्चा हो तथा सूचना के अधिकार और न्याय तक पहुंच जैसे संवैधानिक साधनों का प्रभावी उपयोग हो—ये कदम नागरिकों की भागीदारी को मजबूत कर सकते हैं।

इसके साथ ही नागरिकों को भी चुनाव के समय किए गए वादों, प्रतिनिधियों के कामकाज और सरकारी नीतियों का तथ्यपूर्ण आकलन करना चाहिए। लोकतंत्र में मताधिकार पांच साल में एक बार इस्तेमाल होने वाला अधिकार भर नहीं है; नागरिक भागीदारी एक निरंतर प्रक्रिया है।

लोकतंत्र की मजबूती का पैमाना यह नहीं कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है, बल्कि यह है कि सत्ता जनता के प्रति कितनी जवाबदेह है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं और नीतियों में परिवर्तन होता रहता है, लेकिन जनता के अधिकार और उसकी गरिमा स्थायी महत्व रखते हैं।

यदि आम आदमी को अपनी समस्या बताने के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़े, उसकी शिकायत पर सुनवाई न हो और उसकी असहमति को गंभीरता से लेने के बजाय खारिज कर दिया जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र में जनता की आवाज़ कमजोर हुई है या नहीं, इसका अंतिम फैसला किसी नारे से नहीं, बल्कि जमीनी अनुभवों, संस्थागत जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति से होना चाहिए।

सत्ता को यह याद रखना होगा कि जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक आधारशिला है। उसकी आवाज़ सुनना सत्ता का एहसान नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी है।

क्योंकि जिस लोकतंत्र में जनता सवाल पूछना छोड़ दे, वहां खामोशी को सहमति समझने का खतरा पैदा हो जाता है। और जिस लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनी जाती है, वहां सत्ता भी जवाबदेह रहती है और व्यवस्था में सुधार की संभावना भी जीवित रहती है।