Friday, 30 October 2026 | 9:19 PM
संपादकीय

दो कमरे, एक पहचान-पत्र और लोकतंत्र में खोती नागरिक की पहचान

एक ही दिन दिल्ली में दो कमरे खुले। एक में नागरिक अपने कटे हुए मतदाता नाम को वापस पाने की उम्मीद लेकर पहुँचा, दूसरे में जंतर-मंतर पर जुलाई में हुई पुलिस कार्रवाई के आरोपों पर गवाही देने। दोनों जगह पहचान-पत्र अनिवार्य था। यह लेख भारतीय लोकतंत्र की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ नागरिक को अपनी पहचान साबित करने के लिए बार-बार दस्तावेज़ दिखाने पड़ते हैं, लेकिन उसके अधिकारों और सम्मान की सुरक्षा की गारंटी सहजता से नहीं मिलती।
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दो कमरे, एक पहचान-पत्र और लोकतंत्र में खोती नागरिक की पहचान
भारतीय लोकतंत्र में नागरिक की पहचान और अधिकारों पर सवाल उठाता प्रतीकात्मक दृश्य।
कल दिल्ली में दो कमरे खुले थे। दोनों में नागरिक अपना पहचान-पत्र लेकर गया। पहला कमरा सर्वोच्च न्यायालय का। वहाँ दिल्ली की मतदाता-सूची पर सुनवाई थी। अदालत ने आयोग से कहा कि जिन लोगों के नाम ड्राफ़्ट सूची से कट गए हैं, उनके लौटने का रास्ता आसान करो, तीस अक्टूबर की दीवार पर मत अड़ो, लोगों को बताओ कि करना क्या है। आयोग ने कहा, विचार करेंगे। सोचिए, एक नागरिक जिसने सात चुनावों में वोट दिया है, उसके लिए देश की सबसे ऊँची अदालत को यह कहना पड़ा कि इसे वापस आने दो। और वह नागरिक आज रात भी नहीं जानता कि उसे काटा किस आधार पर गया था। आधार ट्रेड सीक्रेट है। लौटने का फ़ॉर्म कहता है, लिखो कि तुम पहली बार मतदाता बन रहे हो। दूसरा कमरा रूज़ एवेन्यू की एक इमारत में, जिसका नाम शिक्षा सदन है। वहाँ सर्वोच्च न्यायालय की बनाई समिति साढ़े ग्यारह से तीन बजे तक बैठी। जुलाई में जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन में जो हुआ, उसके बारे में जो भी कहना चाहे, आकर कहे। आरोप भारी हैं, पेलेट गन, लड़कियों के साथ बदसलूकी, ज़रूरत से ज़्यादा बल। सब "कथित", समिति तय करेगी। शर्त बस एक थी: वैध पहचान-पत्र साथ लाइए। अब इन दो कमरों को एक साथ रखिए। पहले कमरे में नागरिक इसलिए खड़ा है कि सूची कहती है तुम नहीं हो। दूसरे कमरे में नागरिक इसलिए खड़ा है कि जुलाई में उस पर जो हुआ, वह किसी सूची में नहीं है। दोनों जगह उसे अपना पहचान-पत्र दिखाना है। एक जगह यह साबित करने के लिए कि वह ज़िंदा है, दूसरी जगह यह बताने के लिए कि उसे किसने मारा। और दोनों कमरे इसीलिए खुले हैं कि कहीं कोई अदालत ज़िद पर अड़ गई। आयोग ने अपने-आप नहीं खोला, पुलिस ने अपने-आप नहीं खोला। कमरे नागरिक के लिए नहीं खुले, आदेश के लिए खुले। मुझे इस पूरे दिन में शिक्षा सदन नाम सबसे ज़्यादा चुभा। जिस इमारत का नाम शिक्षा है, वहाँ आज देश को सबक मिला कि इस लोकतंत्र में सवाल पूछने की कीमत क्या है, और जवाब माँगने में कितने महीने लगते हैं। जुलाई से अक्टूबर। जिन्होंने जुलाई में पूछा था, उनमें से कुछ बीच में सात दिन तिहाड़ भी हो आए। आज उन्हें कहा गया, आइए, अब बताइए।
और एक बात, जो हँसी में नहीं कही जा सकती। समिति ने गवाहों के लिए ऑनलाइन पोर्टल इसलिए बनाया कि "संवेदनशील गवाहों के हित सुरक्षित रहें।" यानी व्यवस्था मानती है कि जो आज सच बोलने आया है, उसे कल ख़तरा हो सकता है। एक लोकतंत्र में, राजधानी में, अदालत की बनाई समिति के सामने, गवाह को छिपाना पड़ रहा है। यह वाक्य मैं पहले नहीं लिख पाया था। आज लिखना पड़ा। बाबासाहेब ने संविधान सौंपते हुए कहा था कि अधिकार क़ानून से नहीं, समाज की नैतिक चेतना से सुरक्षित रहते हैं; क़ानून तो बस उसकी छाया है। आज दोनों कमरों में क़ानून की छाया थी। चेतना बाहर सड़क पर कहीं थी, और उसे भी पहचान-पत्र दिखाना था। एक नागरिक के पास इस देश में सबसे ज़्यादा जो चीज़ है, वह पहचान-पत्र है। सबसे कम जो चीज़ है, वह पहचान है। आज आप किस कमरे में खड़े होते? सूची वाले में, या जुलाई वाले में? या आप उन लोगों में हैं जिन्हें अभी किसी कमरे की ज़रूरत नहीं पड़ी, और जो सोचते हैं कि पड़ेगी भी नहीं