Friday, 06 November 2026 | 10:11 PM
संपादकीय

दीपोत्सव की रोशनी और मतदाता सूची का अंधेरा: चुनाव आयोग, कागज़ और चुपचाप बदले गए नियम

यह लेख हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची (फॉर्म 6) और घोषणा-पत्र से जुड़े नियमों में किए गए चुपचाप बदलावों पर आधारित है। इसमें एक तरफ अयोध्या के दीपोत्सव और बाजार की महंगाई (जैसे महंगे सूखे मेवे) का जिक्र है, तो दूसरी तरफ मतदाता सूचियों से गायब हो रहे करोड़ों लोगों के नाम, पीलीभीत की गड़बड़ियों और अग्निवीर योजना पर नीतिगत बदलावों पर तीखा वैचारिक व्यंग्य किया गया है। अंत में पाठकों से अपील की गई है कि वे डरे हुए नागरिकों तक सही जानकारी पहुँचाएं ताकि वे अपना नाम जुड़वा सकें।
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दीपोत्सव की रोशनी और मतदाता सूची का अंधेरा: चुनाव आयोग, कागज़ और चुपचाप बदले गए नियम
टेबल पर चुनाव आयोग के 'फॉर्म 6' (Form 6) के कागज़ और एक टैबलेट रखा हुआ है, जिस पर डिजिटल मतदाता सूची और डेटा का विश्लेषण दिखाई दे रहा है।
कल तक निर्वाचन आयोग सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा देकर कह रहा था कि फ़ॉर्म छह में कोई बदलाव नहीं हुआ।
आज सुबह अख़बार में ख़बर है कि आयोग ने ऑनलाइन प्रक्रिया बदल दी, फ़ॉर्म छह और घोषणा-पत्र को अलग कर दिया। जो चीज़ कभी जोड़ी ही नहीं गई थी, वह अलग कैसे हो गई?
यह सवाल मैं नहीं पूछ रहा, यह सवाल आयोग का अपना हलफ़नामा उसके अपने परिपत्र से पूछ रहा है।
पंद्रह बिंदुओं का हलफ़नामा सोमवार को गया था। बुधवार को अदालत ने पूछा कि क्या आयोग मतदाता को सज़ा दे सकता है।
 गुरुवार सुबह घोषणा-पत्र फ़ॉर्म से उतर गया। तीन दिन। उन दो आयुक्तों ने जुलाई में जो लिखा था और जिसे चौदह पन्नों में अट्ठाईस रुपये के पीछे छिपाया गया, वही बात अब आयोग ख़ुद चुपचाप कर रहा है। बिना यह माने कि वह ग़लत था। लोकतंत्र में संस्थाएँ ग़लती मानती नहीं, ग़लती से चुपचाप पीछे हटती हैं, और उसे "प्रक्रिया में बदलाव" कहती हैं।
और आज ही सुबह संघ के सरकार्यवाह ने पूछा है, मतदाता-सूची सुधारने में ग़लत क्या है? जवाब सीधा है। कुछ भी ग़लत नहीं। सूची सुधरनी चाहिए, मरे हुए नाम हटने चाहिए, दोहरे नाम कटने चाहिए। ग़लत "सुधार" शब्द का अर्थ है।
ज्यां द्रेज़ ने परसों आँकड़ा दिया था: सुधार से पहले सूची वयस्क आबादी का निन्यानवे प्रतिशत थी, सुधार के बाद पचासी। जिस सुधार में चौदह प्रतिशत आबादी घट जाए, उसे सुधार नहीं, छँटाई कहते हैं। एक बात और। पीलीभीत में अंतिम सूची छपने के बाद दस हज़ार चार सौ सत्तर प्रविष्टियाँ बदली गईं, बिना किसी फ़ॉर्म के। सरकार्यवाह का सवाल उन दस हज़ार पर भी लागू होना चाहिए। उसमें ग़लत क्या है, यह भी पूछ लीजिए।
अब आज की बाकी रोशनी।
अयोध्या में आज से पाँच दिन का दीपोत्सव शुरू हो रहा है। हर साल दीयों का नया रिकॉर्ड, इस साल भी बनेगा। सरयू के किनारे लाखों दीये जलेंगे और दुनिया देखेगी। मैं दीयों के विरुद्ध नहीं हूँ, मेरा घर भी जलाएगा। बस एक हिसाब साथ रखिए। द्रेज़ के अनुमान से इस सुधार के बाद बारह करोड़ वयस्क अंतिम सूची से बाहर होंगे। सरयू पर जितने दीये जलेंगे, उससे चार सौ गुना लोग अंधेरे में होंगे, मतदाता-सूची के अंधेरे में। रोशनी गिनी जाएगी। वे नहीं।
बाज़ार की ख़बर है कि सूखे मेवे रिकॉर्ड महँगे हैं, दिवाली का उपहार महँगा हुआ, कंपनियों ने डिब्बे छोटे कर दिए। डिब्बा वही, काजू कम। जैसे सूची वही, नागरिक कम। इस साल हर चीज़ का डिब्बा वैसा ही है, भीतर का माल घट गया है।
और सेना से एक ख़बर, जिस पर व्यंग्य नहीं करूँगा। अग्निवीरों की सेवा अवधि बढ़ाने की बहस चल रही है, क्योंकि चार साल में प्रशिक्षित जवान को खो देना नया जवान भर्ती करने से कहीं महँगा पड़ता है। यह बात 2022 में ही कही गई थी, सड़कों पर, और तब उसे "अराजकता" कहा गया था। चार साल बाद वही बात अब फ़ाइल में है। इस देश में सही बात को सही मानने में उतना ही समय लगता है जितना एक अग्निवीर की नौकरी का।
एक व्याख्यान का शीर्षक है "दो में से एक का चुनाव"।  मनुष्य के सामने हर क्षण दो रास्ते होते हैं, सुविधा का और सत्य का, और समाज का भविष्य इस बात से तय होता है कि उसकी संस्थाएँ किसे चुनती हैं। आयोग ने तीन दिन में दोनों चुन लिए, सोमवार को सुविधा, गुरुवार को सत्य, और दोनों के बीच कोई स्पष्टीकरण नहीं।  दूसरा सूत्र भी याद रखिए, जो उनके युग-निर्माण संकल्प की पहली पंक्ति है: हम बदलेंगे, युग बदलेगा। आयोग ने फ़ॉर्म बदला है। ख़ुद को नहीं।
एक काम आज कीजिए। जो लोग अक्टूबर में "घोषणा-पत्र" देखकर फ़ॉर्म भरने से डर गए थे, उन्हें बताइए कि अब वह अलग हो गया है, आज से सिर्फ़ फ़ॉर्म छह से नाम जुड़ सकता है। दिल्ली में पच्चीस नवंबर तक समय है। जिस डर ने उन्हें रोका था, वह डर आज सुबह आयोग ने ख़ुद उतार दिया। बस बताया नहीं। बताने का काम हमारा है।
घोषणा-पत्र उतर गया। अब सवाल यह है कि वह लगाया किसने था, और उसकी कीमत किसने चुकाई। आपके मोहल्ले में कितनों ने?