Tuesday, 03 November 2026 | 2:22 AM
संपादकीय

नया शब्दकोश: जब ख़बरें नहीं बदलतीं, तो शब्दों के मायने बदल जाते हैं

"जब ख़बरें नहीं बदलतीं, तो व्यवस्था शब्दों के अर्थ बदल देती है। हवा में घुला 'ज़हर' मौसमी समस्या बन जाता है, राजनीतिक हिंसा की भरपाई 'राहत' कहलाती है और 'नागरिक' सिमटकर केवल 'लाभार्थी' रह जाता है। समसामयिक घटनाओं के आईने में आज की व्यवस्था का एक सटीक व्यंग्यात्मक शब्दकोश।"
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नया शब्दकोश: जब ख़बरें नहीं बदलतीं, तो शब्दों के मायने बदल जाते हैं
व्यवस्था का नया शब्दकोश: शब्दों के बदले मायने
आज सुबह मैंने तय किया कि अख़बार नहीं, शब्दकोश लिखूँगा। क्योंकि इस देश में ख़बरें नहीं बदलतीं, शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। कुछ प्रविष्टियाँ, आज की ख़बरों से।
ज़हर, संज्ञा। दिल्ली-एनसीआर की हवा में इस समय जो घुला हुआ है। अख़बार की आज की पहली सुर्ख़ी।
हर साल नवंबर के पहले हफ़्ते में यह शब्द पहले पन्ने पर आता है और दिसंबर के तीसरे हफ़्ते में भीतर चला जाता है। ज़हर वही रहता है, पन्ना बदल जाता है। समानार्थी: मौसमी समस्या।

मेला, संज्ञा। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आरोग्य मेला, जहाँ हर रविवार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीज़ों को "बेहतर सुविधाएँ" मिलती हैं। कल बदायूँ में अख़बार ने जाकर देखा तो दावों की "हक़ीक़त उलट" निकली। मेला शब्द का अर्थ है वह जगह जहाँ लोग आते हैं और सामान नहीं होता। चिकित्सा में भी यही अर्थ लागू है।

राहत, संज्ञा। बंगाल सरकार का बड़ा फ़ैसला: राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों को ग्रुप डी की नौकरी। ग़ौर कीजिए। राज्य ने स्वीकार कर लिया कि राजनीतिक हिंसा एक स्थायी व्यवस्था है जिसके लिए स्थायी भर्ती-नियम चाहिए। अगला क़दम शायद पेंशन योजना हो। राहत का अर्थ अब यह है कि आपकी मौत के बाद आपका बेटा चपरासी बन सकता है, बशर्ते आपकी मौत सही पार्टी की हिंसा में हुई हो। यह शर्त अभी स्पष्ट नहीं की गई है।

शादी का खाना, संज्ञा। मुंबई में कल सत्ताईस लोग इसे खाकर बीमार हुए, दूल्हा-दुल्हन समेत। सबकी हालत स्थिर। यह अकेली ख़बर है जिसमें "हालत स्थिर" शब्द वाक़ई अच्छी ख़बर है। बाकी सब जगह "स्थिति स्थिर है" का अर्थ होता है कि कुछ नहीं बदलेगा।

गतिरोध, संज्ञा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर, जहाँ पिछले हफ़्ते चार टैंकरों में धमाके हुए थे, अब "दूर होने के संकेत" हैं। संकेत वह चीज़ है जो तेल के भाव पहले पढ़ लेते हैं और आपका पेट्रोल पंप बाद में। भाव ऊपर जाने में एक दिन लगता है, नीचे आने में एक तिमाही।
ट्रेड सीक्रेट, संज्ञा। पिछले हफ़्ते की प्रविष्टि, पर अब भी प्रचलित। वह सॉफ़्टवेयर जिसने मतदाता-सूची से नाम काटे। कल तक सर्वोच्च न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक, तीनों को अलग-अलग उत्तर मिल चुके हैं। शब्द का अर्थ: ऐसी गोपनीयता जो कंपनी की नहीं, नागरिक से है।
सर्वसम्मति, संज्ञा। जब तीन में से दो चौदह बार असहमत हों और हलफ़नामे में लिखा जाए कि सब एकमत थे। प्राचीन अर्थ: सबकी सहमति। आधुनिक अर्थ: एक की सहमति, बाकी की चुप्पी।

अनुमति, संज्ञा। जो कल रामलीला मैदान को दस से पाँच मिली थी और उस तक पहुँचने वाली दो किलोमीटर सड़क को नहीं मिली। लोकतंत्र में अनुमति वह दरवाज़ा है जो मैदान तक खुलता है, रास्ते तक नहीं।
विसंगति, संज्ञा। आपके और आपके दादा की उम्र के बीच वह अंतर जो सॉफ़्टवेयर को ठीक नहीं लगता। इसी शब्द से दिल्ली में उन्नीस लाख तैंतीस हज़ार लोगों को नोटिस गया। पुराना अर्थ: तर्क की ग़लती। नया अर्थ: आपके होने की ग़लती।
मिडटर्म, संज्ञा। अमेरिका में दो दिन बाद चुनाव, जहाँ राष्ट्रपति को डर है कि कांग्रेस हाथ से निकल जाएगी, और वह कह रहा है कि वीटो चलाएगा। यानी वहाँ का सबसे ताक़तवर आदमी हार की तैयारी सार्वजनिक रूप से कर रहा है। यह शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं है। हमारे यहाँ हार की तैयारी नहीं की जाती, हार की जाँच की जाती है, और जाँच की रिपोर्ट ट्रेड सीक्रेट होती है।
और अंतिम प्रविष्टि।
नागरिक, संज्ञा। वह शब्द जो ऊपर की हर प्रविष्टि में आता है, पर किसी में बोलता नहीं। ज़हर उसकी साँस में है, मेला उसके ज़िले में, राहत उसकी मौत के बाद, विसंगति उसके नाम में, अनुमति उसके रास्ते पर। वह हर परिभाषा का विषय है और किसी परिभाषा का लेखक नहीं। शब्दकोश में उसकी प्रविष्टि सबसे छोटी है: देखें, "लाभार्थी"।

 शब्दों का अर्थ बदलना सबसे चुपचाप होने वाली क्रांति है, क्योंकि जब "सेवा" का अर्थ "सत्ता" हो जाए तो कोई विरोध नहीं करता, सब बस नए अर्थ में जीने लगते हैं। बाबासाहेब ने संविधान की भाषा में इसीलिए हर शब्द की परिभाषा लिखवाई थी, ताकि कोई बाद में उसे न बदल सके। आज वे परिभाषाएँ वहीं हैं। बदले हम हैं।
आपके शहर के शब्दकोश में इस हफ़्ते किस शब्द का अर्थ बदला? एक शब्द लिखिए, मैं अगली प्रविष्टि उसी पर लिखूँगा।