Friday, 06 November 2026 | 10:36 PM
संपादकीय

अमेरिका की हार, ईरान का युद्ध और हमारी रसोई: लोकतंत्र के आईने में आज की राजनीति

यह आलेख हालिया अमेरिकी मध्यावधि चुनावों, ईरान युद्ध और भारत की जमीनी व राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच एक गहरा वैचारिक सेतु बनाता है। लेखक अमेरिका में सत्ता द्वारा हार स्वीकार न करने की प्रवृत्ति और ईरान युद्ध के आर्थिक दुष्परिणामों की तुलना भारत की घरेलू दशा—महंगाई (जैसे प्याज के दाम), संसद की कमजोर होती भूमिका, और निर्वाचन आयोग की कार्यशैली—से करते हैं। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों के मार्फत लेखक यह समझाते हैं कि जो सत्ता अपनी पराजय को स्वीकार नहीं करती, वह कभी सीख नहीं ले सकती। अंत में यह सवाल उठाया गया है कि जिस युद्ध का आर्थिक बोझ आम जनता ने उठाया और जिन लोकतांत्रिक अधिकारों पर पहरे लगे, उस पर जनता को अपनी वास्तविक ताकत दिखाने का अवसर कब मिलेगा।
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अमेरिका की हार, ईरान का युद्ध और हमारी रसोई: लोकतंत्र के आईने में आज की राजनीति
अमेरिका की हार, ईरान का युद्ध और हमारी रसोई: लोकतंत्र के आईने में आज की राजनीति" जैसे गंभीर विषयों पर प्रकाश डालते हुए, यह विश्लेषण राजनीति, लोकतंत्र और बढ़ती महंगाई के बीच के जटिल संबंधों की पड़ताल करता है। यह लेख आम जनता के दृष्टिकोण से इन मुद्दों को समझने का प्रयास करता है।
एक युद्ध है जिसे लड़ने वाले देश की आधी जनता समझ नहीं पाई कि क्यों लड़ा जा रहा है।
एक चुनाव है जिसमें सबसे बड़ी हार हुई और सबसे बड़ा आदमी कहता है कि हार उसकी नहीं है। और एक तेल की क़ीमत है जो इन दोनों को अच्छी तरह समझती है। कल रात इन तीनों ने अमेरिका में एक-दूसरे को पहचान लिया। आज सुबह उनकी परछाइयाँ हमारे अख़बार में हैं।

पहले वाक्य से शुरू करते हैं, क्योंकि यह वाक्य याद रखने लायक है। डेमोक्रेट्स ने सदन और सीनेट दोनों छीन लिए, सात सीनेट सीटें पलटीं, टेक्सास बत्तीस साल बाद नीला हुआ, और राष्ट्रपति ने कहा, "मैं इसे अपनी हार नहीं मानता, मैं बैलेट पर नहीं था।" जिस आदमी के नाम पर हर रैली, हर पोस्टर, हर उम्मीदवार खड़ा था, वह नतीजे वाली रात बैलेट से उतर गया। जीत का चेहरा एक होता है, हार अनाथ होती है। यह वाक्य सुनकर मुझे अपने देश के कई राज्य याद आए, जहाँ चुनाव एक चेहरे पर लड़ा जाता है और हार के बाद "स्थानीय कारण" ढूँढे जाते हैं। अमेरिका ने कल रात हमें एक मुहावरा उधार दिया है। संभाल कर रखिए, 2027 में काम आएगा।
दूसरा, युद्ध। उपराष्ट्रपति ने खुले तौर पर लिखा कि ईरान युद्ध ने हरवाया, पेट्रोल महँगा हुआ, लोग नाराज़ हुए। राष्ट्रपति ने माना कि यह "काफ़ी हद तक सच" है, और फिर कहा कि युद्ध फिर भी सही था, मौक़ा मिले तो फिर करूँगा। यानी जनता ने जिस चीज़ पर सज़ा दी, नेता उसी पर अडिग है। लोकतंत्र में यह दृश्य दुर्लभ नहीं है, बस इतने खुले में कम दिखता है। तेहरान में इस पर उत्सव है, वहाँ के वार्ताकार कह रहे हैं कि अमेरिकी जनता ने युद्ध ठुकराया। और होर्मुज़ में आज सुबह फिर दो टैंकर जल रहे हैं।
अब परछाइयाँ।
पहली परछाई हमारी रसोई में है। उस युद्ध का तेल-बिल अमेरिका के मतदाता ने कल रात वोट से चुकाया। हमने उसे प्याज़ की एक सौ आठ प्रतिशत महँगाई से चुकाया, साढ़े पाँच प्रतिशत की खुदरा महँगाई से चुकाया, और ओमान के पास मारे गए उस नाविक से चुकाया जिसका नाम अब भी दूतावास की फ़ाइल में है। हमने बिल भरा, वोट का मौक़ा नहीं मिला, क्योंकि युद्ध हमारा नहीं था। बस उसकी कीमत हमारी थी।

दूसरी परछाई संसद में है। अमेरिकी सीनेट के नए नेता ने कहा, "हम युद्ध ख़त्म करेंगे," और तरीक़ा बताया: सदन के पास ख़र्च रोकने की ताक़त है। एक विधायिका कार्यपालिका का युद्ध रोक सकती है, यह लोकतंत्र की सबसे पुरानी नली है। अब अपनी संसद देखिए। वहाँ अप्रैल में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग का नोटिस स्वीकार ही नहीं हुआ। वहाँ विपक्ष को "संसद में आइए" कहा जाता है और दरवाज़ा भीतर से बंद रखा जाता है। जिस सदन के पास ख़र्च रोकने की ताक़त है, वह नोटिस स्वीकार करने की ताक़त खो चुका है।
तीसरी परछाई आज सुबह की ख़बर में है। निर्वाचन आयोग ने चुपचाप फ़ॉर्म छह से वह घोषणा-पत्र अलग कर दिया जिसके बारे में सोमवार को उसने अदालत में कहा था कि कभी जोड़ा ही नहीं गया। तीन दिन में हलफ़नामा और परिपत्र एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो गए। अमेरिका में सत्ता ने कल रात हार मानी, भले ही उसे अपनी न कहा। यहाँ संस्था ने आज सुबह ग़लती मानी, भले ही उसे "प्रक्रिया में बदलाव" कहा। फ़र्क़ यह है कि वहाँ जनता ने गिनकर मनवाया, यहाँ अदालत ने पूछकर।
एक चीज़ और है जो सुर्ख़ी नहीं बनी। अमेरिका में कल राष्ट्रपति के सलाहकार मज़ाक़ में कह रहे थे कि हार के बाद इज़राइल में शरण लेनी पड़ेगी। मज़ाक़ था। पर उस मज़ाक़ के नीचे एक सच है, कि वहाँ सत्ता को हार का डर था। डर ही लोकतंत्र की असली मुद्रा है। जिस दिन सत्ता को जनता से डर लगना बंद हो जाए, उस दिन मतदाता-सूची ट्रेड सीक्रेट हो जाती है।
 "कसौटी के लिए तैयार रहें"। व्यक्ति और संस्था की परख सुख में नहीं, पराजय में होती है, और जो पराजय को अपना नहीं मानता, वह उससे सीख भी नहीं सकता। कल रात एक राष्ट्रपति कसौटी पर चढ़ा और उसने कहा, मैं बैलेट पर नहीं था। आज सुबह एक आयोग कसौटी पर चढ़ा और उसने कहा, यह सिर्फ़ प्रक्रिया का बदलाव है। दोनों ने कसौटी देखी। दोनों ने अपना चेहरा नहीं देखा।
अब आप बताइए। जिस युद्ध का बिल आपने प्याज़ और पेट्रोल में भरा, और जिस सूची से आपका नाम कटा, उन दोनों पर आपको वोट का मौक़ा कब मिलेगा? और मिलेगा तो क्या उस दिन कोई कहेगा, "मैं बैलेट पर नहीं था"?