क्या आत्मा होती है ?
यदि हां तो- आत्मा शरीर के कौन से हिस्से में रहती है और यदि नहीं ,तो ऐसा क्या है जिसके निकल जाने पर इंसान या किसी जीव की मृत्यु हो जाती है ?
ऐसे न जाने कितने ही सवाल हमारे मन में आते हैं , जिनका जवाब हमारे पास नहीं होता.
हमारे शरीर या किसी भी जीव जंतुओं में आत्मा नाम की कोई चीज नहीं होती,
जिसे हम आत्मा कहते हैं वह एक चेतना है या ऊर्जा का संचार तंत्र है जो हमारे शरीर में निरंतर संचारित होता रहता है. यह ऊर्जा ही चेतना है और चेतना ही ऊर्जा है, शरीर में चेतना का संचार तब तक संचारित रहता है जब तक कि हमारे गतिशील शरीर रूपी मशीनरी को उर्जा मिलती रहे ,
इसके अभाव में यह मशीन कमजोर और मंद पड़ जाएगी और अंत में निष्प्राण होकर गिर जाएगी.
ऐसा नहीं है कि आत्मा के बाहर निकलते ही शरीर मृत हो जाता है या शरीर के मृत होते ही इसमें बसने वाली आत्मा बाहर निकल जाती है ,आत्मा एक काल्पनिक चीज है हमारा शरीर ना तो आत्मा से चलता है और ना ही कोई अन्य अलौकिक शक्ति इसे संचालित करती है शरीर में आत्मा होने की सोच तब विकसित हुई थी जब आम लोगों को शरीर तंत्र के बारे में ज्यादा ज्ञान नहीं था.
पौराणिक समय में मनुष्य को प्रकृति की हर वस्तु या घटना एक अलौकिक शक्ति से संचालित होने वाली लगती थी इसलिए मनुष्य ने प्रत्येक प्राकृतिक घटना को किसी देवता या ईश्वर से जोड़ रखा था जैसे प्रकाश को सूर्य देव, ऊष्मा को अग्निदेव, वायु आंधी तूफान को पवनदेव ,वर्षा को इंद्रदेव, जल को वरुण देव इत्यादि से जोड़कर इन देवताओं को ही इनके नियंत्रक समझते थे, उस समय जब विज्ञान ने इतनी उन्नति नहीं की थी तब मानव को शरीर तंत्र के बारे में इतनी जानकारी नहीं थी जिसके कारण हम शरीर को अलौकिक शक्ति द्वारा संचालित एक आत्मा युक्त शरीर समझते थे मगर आज विज्ञान ने शरीर की इस जटिलता को बहुत अच्छी तरह समझ लिया है और विज्ञान के पास सारे जवाब हैं मगर विज्ञान की शब्दावली आम लोगों की समझ से परे है फल स्वरूप हम आम लोग शरीर तंत्र को अभी भी नहीं समझ पाए हैं विगत काल तक तो वैज्ञानिक भी कई धारणाओं को आम लोगों तक समझाने में सफल नहीं हुए मगर आज सब कुछ संभव है, विज्ञान के पास शरीर में आत्मा की स्थिति हीनता के बारे में बहुत सारे प्रमाण हैं फिर भी आज विज्ञान के दौर में भी शिक्षित वर्ग का बड़ा समूह आत्मा और पुनर्जन्मों में उलझा हुआ है ,
आत्मा के बारे में धार्मिक लोगों के विचार हैं कि आत्मा अजर-अमर है इसको न अग्नि जला सकती है और ना जल डुबो सकता है इसे किसी शस्त्र से भी नहीं काटा जा सकता और ना ही इसे हवा उड़ा सकती है.
इस प्रकार इनकी धारणा है कि आत्मा ना कभी मरती है और ना कभी जन्म लेती है
इस विचार से तो हमारे शरीर की गतिशीलता का कारण आत्मा ही है फिर तो पेड़-पौधे भी सजीव हैं उनकी आत्मा के बारे में धार्मिको का क्या विचार है और बहुत से पेड़-पौधे तो ऐसे भी होते हैं जिनका एक छोटा सा पार्ट काट कर मिट्टी में दबा दो तो वह एक अलग नया पेड़ का आकार ले लेगा इस हिसाब से तो आत्मा को कई हिस्सों में बांटा भी जा सकता है और एक आत्मा से कई नई आत्माएं बनाई जा सकती हैं लेकिन फिर धार्मिक लोगों के अनुसार तो आत्माएं जन्म लेती ही नहीं पर इस प्रकार तो हम आत्माओं की फैक्ट्री खोल सकते हैं और कई नहीं आत्माएं पैदा कर सकते हैं
हमारे शरीर की गतिशीलता के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि आत्मा भी गतिशील लक्षण वाली है तब वह पेड़ पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति क्यों नहीं प्रदान करती है
पेड़ को बार-बार काटे जाने पर भी प्रायः आत्मा उसका साथ नहीं छोड़ती है मगर निश्चित सीमा से अधिक मनुष्य के अंग-भंग कर दिए जाएं तो है निष्प्राण हो जाएगा.
ऐसा क्यों ?
यदि हमें बहुत देर तक जल में डुबो दिया जाए या फिर आग में जलाया जाए तो हमारी मृत्यु हो जाएगी इसका मतलब क्या हमारी आत्मा जल में डूब ने व आग में तपकर डरती और मरती भी है , मगर इसके विपरीत प्रश्न उठता है कि क्या किसी मछली की आत्मा जल के बिना नहीं रह सकती क्या उसकी आत्मा जल के बिना तड़पने लगती है यदि छिपकली की पूंछ काट दी जाए तो उसका शरीर और पूछ दोनों हिलते हैं ,उसके शरीर के साथ उसकी पूंछ भी लपलपाती है,
अब प्रश्न यह है कि यदि जीवों के शरीर में हरकत होने की वजह आत्मा ही है तो क्या छिपकली की आत्मा के दो टुकड़े हो गए ,
यदि शरीर की चेतना का कारण आत्मा ही है ,तो यहां इसके 2 टुकड़े भी हुए तो भी पूछ लपलपा रही है ऐसा लगता है चेतना या आत्मा को ठेंगा दिखा रही है ,जो लोग आत्मा में विश्वास करते हैं वे भी किसी सज्जन की मृत्यु पर फूट-फूटकर रोते हैं ,जब आत्मा मरती ही नहीं तो फिर इस मातम का क्या अर्थ है ?
दरअसल लोगों को स्वयं के विश्वासों पर भी भरोसा नहीं है यह बेकार की विश्वास भी उन्हें कठिन परिस्थितियों में आराम नहीं देते तो अपने भी ऐसे विश्वासों को छोड़कर सच को समझे और उसका सामना करें इसीलिए कार्ल मार्क्स ने इन सभी विश्वासों को नशा कहा था कि नशे से ज्यादा कुछ नहीं लेकिन अगर
सोचें कि हम वैज्ञानिक सच को स्वीकार करें और हर मनुष्य को एक मृत्यु की ओर बढ़ते एक साथी के रूप में देखें तो सभी से प्रेम करना आसान होगा नहीं तो एक इस्लामी आतंकवादी के लिए मृत्यु के बाद जीवन की आशा पर जीवित लोगों को मारना आसान हो जाता है
गीता आत्मा के आधार पर ही हत्या को उचित ठहराती है कि आत्मा कभी मरती नहीं है और मृत्यु के बाद आत्मा को न्याय मिलता है , जब लोग यह समझेंगे कि मृत्यु के बाद कुछ भी नहीं तब जाकर समाज में दबे कुचले लोगों के लिए न्याय की बात इसी जीवन में पृथ्वी पर ही संभव होगी ,क्योंकि तब मरने वाले और मारने वाले किसी के भी पास मृत्यु के बाद स्वर्ग या नर्क मिलने की आशा या परमात्मा की न्याय की आशा नहीं होगी ||~ कौशलेंद्र~||
क्या आत्मा होती है ?
