5 दिन की हीटवेव बन सकती है 30 हजार मौतों की वजह, भीषण गर्मी के बीच आई डराने वाली रिपोर्ट

देश में लगातार बढ़ती भीषण गर्मी अब सिर्फ मौसम की परेशानी नहीं, बल्कि बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में एक दिन की अत्यधिक गर्मी से करीब 3400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जबकि लगातार पांच दिन तक चलने वाली हीटवेव लगभग 30 हजार लोगों की जान ले सकती है। यह अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर के शोधकर्ताओं ने किया है। रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है और लोग भीषण लू का सामना कर रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में गर्मी से होने वाली मौतों का आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं पियूष नारंग और अशोक गाडगिल ने भारत के 10 शहरों में गर्मी से होने वाली मौतों के पुराने आंकड़ों का विश्लेषण कर देशभर के जिलों के लिए अनुमान तैयार किया। यह अध्ययन ‘फ्रंटियर्स इन एनवायरमेंटल हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें ‘एक्सेस डेथ’ यानी अतिरिक्त मौतों का आकलन किया गया। इसका मतलब है कि सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कितने ज्यादा लोगों की मौत गर्मी के कारण हो सकती है। अध्ययन के अनुसार, पांच दिन की भीषण हीटवेव के दौरान सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल उत्तर प्रदेश में ही पांच दिन की लू के दौरान करीब 8100 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। वहीं अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे शहरों में एक ही गर्मी की घटना में 250 से ज्यादा मौतों का खतरा है। अध्ययन में बताया गया है कि जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, वहीं गर्मी से मौतों का खतरा सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात देश की कुल अतिरिक्त मौतों का 66 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, जबकि देश की जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी केवल 29 प्रतिशत है। शोधकर्ताओं ने कहा कि यह असमानता बेहद चिंताजनक है। इसका मतलब है कि गरीब और कम संसाधनों वाले राज्य गर्मी का सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के शीर्ष 100 जिले, जहां लगभग एक-तिहाई आबादी रहती है, पांच दिन की हीटवेव के दौरान कुल अनुमानित मौतों का 44 प्रतिशत हिस्सा बन सकते हैं। इससे साफ है कि हीटवेव का खतरा केवल जनसंख्या पर नहीं, बल्कि आर्थिक और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी पर भी निर्भर करता है।

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