फर्रुखाबाद:विदेशी मुद्रा बचाने की अपील पर उठे सवाल, चुनावी खर्च और सरकारी नीतियों पर जनता ने जताई नाराजगी

 
फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 11 मई 2026 देश में विदेशी मुद्रा बचाने को लेकर सरकार और नेताओं द्वारा आम नागरिकों से की जा रही अपीलों पर अब सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया और जनचर्चाओं में लोगों ने आरोप लगाया है कि चुनाव समाप्त होने के बाद अचानक जनता को पेट्रोल, डीजल, सोना, विदेशी सामान और अन्य आयातित वस्तुओं के कम उपयोग की सलाह दी जा रही है, जबकि चुनावी रैलियों और प्रचार के दौरान बड़े पैमाने पर संसाधनों की बर्बादी हुई।लोगों का कहना है कि सरकार ने अमेरिका के साथ बड़ी ट्रेड डील कर हर वर्ष लगभग 100 बिलियन डॉलर के आयात का रास्ता खोला है, जिसमें कृषि उत्पाद भी शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर आम जनता से विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर सोना न खरीदने, विदेश यात्रा कम करने, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने और यहां तक कि खाने के तेल के सीमित उपयोग की सलाह दी जा रही है।आलोचकों ने यह भी कहा कि देश का किसान पहले ही महंगी खेती से परेशान है और उसे डीएपी जैसी उर्वरकों के उपयोग को कम करने की सलाह देना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि डीएपी का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात होता है। लोगों का तर्क है कि यदि विदेशी मुद्रा बचाना इतना जरूरी था तो चुनावी रैलियों में हजारों बसों और बड़े-बड़े काफिलों के उपयोग पर रोक क्यों नहीं लगाई गई।जनता ने आरोप लगाया कि चुनावी सभाओं में कई बसें केवल भीड़ जुटाने के लिए चलाई गईं, जिनमें क्षमता से बहुत कम लोग सफर कर रहे थे। वहीं नेता चार्टर्ड विमानों और विदेशी गाड़ियों के काफिलों में यात्रा करते रहे, तब ईंधन की बर्बादी और विदेशी मुद्रा के नुकसान की चिंता सामने नहीं आई।सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे बयानों में यह भी कहा गया कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका-ईरान तनाव और आर्थिक संकट पहले से मौजूद था, लेकिन विदेशी मुद्रा बचाने की अपील चुनाव खत्म होने के बाद ही सामने आई। इसे लेकर लोगों ने आरोप लगाया कि सरकार के लिए देशहित से अधिक चुनावी राजनीति प्राथमिकता बन गई है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम जनता पर आर्थिक अनुशासन लागू करने से पहले सरकार और राजनीतिक दलों को भी अपने खर्चों और संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता तथा संयम दिखाना होगा। वहीं इस मुद्दे पर सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।