भारत में पर्यावरणीय संकट बन रहा जहरीला कचरा
भारत में खतरनाक औद्योगिक कचरा एक गंभीर समस्या है, हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के नेतृत्व में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय शोध ने भारत में प्रदूषित औद्योगिक जमीन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। इस अध्ययन में कहा गया है कि भारत में औद्योगिक कचरे और प्रदूषित स्थानों के बीच बड़ा अंतर है। इसका मतलब है कि कई ऐसे इलाके हो सकते हैं जो जहरीले पदार्थों से प्रभावित हैं, लेकिन अभी तक उनकी पहचान नहीं हो पाई है।
शोध पत्र में शोधकर्ताओं के हवाले से कहना है कि यह समस्या सिर्फ पर्यावरण की नहीं है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और वन्यजीवों के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है।
गौरतलब है की भारत में हर साल 1.566 करोड़ मीट्रिक टन खतरनाक औद्योगिक कचरा पैदा हो रहा है। इसमें लगभग 46 प्रतिशत लैंडफिल योग्य, 45 प्रतिशत पुनर्चक्रण योग्य और शेष भस्मीकरण योग्य होता है। यह हाल तब है जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड में पूरे देश में 200 से भी कम प्रदूषित या संभावित रूप से प्रदूषित स्थल दर्ज हैं।
स्पष्ट है कि औद्योगिक इकाइयों में बड़ी तादाद में दसियों सालों से संग्रहित खतरनाक और मानव स्वास्थ्य के लिये घातक रासायनिक कचरे के निपटान या प्रबन्धन में सरकार की कोई रुचि नहीं है और न ही अब तक यहाँ के समाज ने इस बारे में कोई बड़ी पहल की है। इससे इनके आसपास का पानी, हवा और मिट्टी प्रदूषित हो रही है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस दलील पर न केवल आश्चर्य जताया बल्कि कड़ी नाराजगी भी व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों का इस तरह गायब होना कानून व्यवस्था और राज्य के राजस्व के लिए एक बड़ा नुकसान है। पीठ ने सवाल उठाया कि आखिर पुलिस कस्टडी में रखे गए महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित क्यों नहीं थे?
अदालत ने कहा कि यह कोई पहला मामला नहीं है जहां चूहों द्वारा साक्ष्य नष्ट किए जाने की बात कही गई हो। इससे पहले भी कई मामलों में नशीले पदार्थों और नकदी के बारे में इसी तरह के बहाने बनाए गए हैं, जो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं।
महिला के वकील ने तर्क दिया कि मुख्य साक्ष्य के अभाव में सजा को बरकरार रखना न्यायसंगत नहीं है, खासकर जब अपील लंबित हो। सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करते हुए महिला की सजा को फिलहाल के लिए स्थगित कर दिया और उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक दोषी को जेल में रखना आवश्यक नहीं है।
