भारत देश में दो तरह के हिंदू पाए जाते हैं। पहला वह जिसकी आबादी लगभग 13 फ़ीसदी है और दूसरा वह जिसकी आबादी लगभग 87 फ़ीसदी है। जबकि 87 फ़ीसदी वाला हिंदू स्वयं को हिंदू मानता है, परंतु 13 फ़ीसदी वाले हिंदुओं की अनेक पारंपरिक धार्मिक धारणाएँ और ग्रंथ इस 87 फ़ीसदी आबादी को समान धार्मिक और सामाजिक दर्जा देने से इंकार करते रहे हैं। इतिहास गवाह है कि सामाजिक संरचना के भीतर यह विभाजन केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भी दिखाई देता है।
यही कारण है कि 13 फ़ीसदी वाला वर्ग सदैव इस स्थिति को बनाए रखने के लिए प्रयासरत दिखाई देता है जिसमें सत्ता, संसाधन और निर्णय लेने वाली संस्थाओं पर उसका प्रभाव बना रहे। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि देश के संसाधनों, अवसरों और प्रभावशाली पदों पर उसका विशेषाधिकार स्वाभाविक अधिकार है। यदि वास्तविक स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो देश की अनेक संवैधानिक, प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षिक और अन्य प्रभावशाली संस्थाओं में इसी वर्ग की उपस्थिति अत्यधिक दिखाई देती है। इसके बावजूद इस वर्ग के भीतर यह भय लगातार दिखाई देता है कि यदि बहुसंख्यक 87 फ़ीसदी आबादी को समान अवसर और समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो गया, तो उनकी पारंपरिक श्रेष्ठता समाप्त हो जाएगी।
इसी मानसिकता के कारण जब भी 87 फ़ीसदी आबादी के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक या राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए कोई कदम उठाया जाता है, उसका विरोध प्रारम्भ हो जाता है। समान अवसर की मांग को योग्यता के विरुद्ध बताया जाता है, प्रतिनिधित्व की मांग को संस्थाओं पर कब्ज़े का प्रयास कहा जाता है और सामाजिक न्याय की नीतियों को समाज के लिए खतरा बताने का प्रयास किया जाता है। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक समाज के हित में उठाए गए अनेक कदमों को विभिन्न स्तरों पर चुनौती दी जाती है और उन्हें प्रभावहीन बनाने का प्रयास किया जाता है।
विडंबना यह है कि जो वर्ग पहले से ही संसाधनों, अवसरों और संस्थागत शक्ति का बड़ा हिस्सा अपने पास रखता है, वही स्वयं को सबसे अधिक असुरक्षित भी प्रदर्शित करता है। जबकि वास्तविकता यह है कि जिन लोगों को सदियों तक शिक्षा, संपत्ति, सम्मान और निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया, उनकी भागीदारी बढ़ाना किसी पर अन्याय नहीं बल्कि न्याय की दिशा में उठाया गया कदम है। सामाजिक न्याय का अर्थ किसी वर्ग से अधिकार छीनना नहीं, बल्कि उन लोगों को अवसर देना है जिन्हें लंबे समय तक अवसरों से वंचित रखा गया।
13 फ़ीसदी वाले वर्ग और उनके समर्थन में खड़ी संस्थाओं को यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र का विकास केवल एक छोटे से वर्ग की प्रगति से संभव नहीं है। यदि देश की विशाल आबादी सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे रह जाएगी, तो राष्ट्र की सामूहिक शक्ति भी कमजोर बनी रहेगी। किसी भी समाज में स्थायी विकास तभी संभव है जब विकास के लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचें।
इसे मानव शरीर के उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि शरीर का एक हाथ और एक पैर कमजोर हो जाए, जबकि शेष अंग स्वस्थ हों, तो उस शरीर को पूर्णतः स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। शरीर तभी स्वस्थ माना जाएगा जब उसके सभी अंग समान रूप से सक्षम, मजबूत और संतुलित हों। ठीक इसी प्रकार कोई भी देश तभी वास्तविक अर्थों में विकसित, शक्तिशाली और समृद्ध बन सकता है जब उसके प्रत्येक वर्ग को समान अवसर, समान सम्मान और समान भागीदारी प्राप्त हो।
इसलिए प्रश्न केवल किसी एक वर्ग के अधिकारों का नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य का है। जब तक 87 फ़ीसदी आबादी को शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में उसकी जनसंख्या के अनुरूप भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक भारत की विकास यात्रा अधूरी रहेगी। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण विशेषाधिकारों की रक्षा से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण भागीदारी और समावेशी विकास से होता है। जिस दिन देश की हर संस्था में देश की वास्तविक सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब दिखाई देने लगेगा, उसी दिन भारत वास्तव में एक समानतामूलक, लोकतांत्रिक और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
एड.अलप भाई पटेल
हाईकोर्ट,इलाहाबाद
9455335575, 6392903754
