भारतीय सिनेमा की सबसे कल्ट-क्लासिक फिल्म ‘शोले’ तो आप सभी ने देखी होगी। कई सिने प्रेमियों ने तो फिल्म को कई-कई बार देखा होगा। हालांकि, 80 के दशक के बाद की पैदाइश वाले लोगों ने इस फिल्म को या तो टीवी, वीएलसी प्लेयर पर देखा है या फिर अपने लैपटॉप और मोबाइल पर। लेकिन अब जेन जी जेनेरेशन से लेकर हर शख्स के पास मौका है ‘शोले’ को और बेहतर क्वालिटी में सिनेमाघरों में बड़े पर्दे पर देखने का। जी हां, क्योंकि साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म के 50 साल पूरे होने पर मेकर्स ने इस कल्ट फिल्म को फिर से सिनेमाघरों में रिलीज किया है, वो भी 4K प्रिंट और डॉल्बी साउंड के साथ। इस बार फिल्म को ‘शोले: द फाइनल कट’ के नाम से रिलीज किया गया है। क्योंकि इस बार फिल्म जितनी शूट हुई थी, उतनी पूरी ही रिलीज की गई है। यानी इस फाइनल कट में आपको कई वो सीन भी देखने को मिलेंगे, जो अब तक रिलीज हुई शोले में नहीं हैं। इसमें अहमद की मौत और फिल्म का क्लाईमैक्स तक शामिल हैं। शोले 15 अगस्त 1975 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। उस वक्त देश में इमरजेंसी का माहौल था। नतीजन न चाहते हुए भी निर्देशक रमेश सिप्पी को फिल्म में कई बदलाव करने पड़े थे। यहां तक कि फिल्म में दिखाया गया क्लाईमैक्स भी वो नहीं है, जिसे सलीम-जावेद ने असल में लिखा था। फिल्म के असली क्लाईमैक्स में ठाकुर (संजीव कुमार) गब्बर (अमजद खान) को अपने कील वाले जूतों से कुचलकर मार डालता है। लेकिन सेंसर बोर्ड ने उस समय इस क्लाईमैक्स को अत्यधिक हिंसक बताते हुए इसे बदलने को कहा। जिसके बाद रमेश सिप्पी को न चाहते हुए भी क्लाईमैक्स को बदलना पड़ा, जिसमें ठाकुर गब्बर को मारता नहीं बल्कि पुलिस के हवाले कर देता है। इसके अलावा भी कई सीन ऐसे थे, जिन्हें सेंसर बोर्ड ने अधिक हिंसक बताकर हटवा दिया था। जबकि कई सीन को फिल्म की अवधि अधिक लंबी होने की वजह से मेकर्स ने खुद बाहर कर दिया था।
अब जब मेकर्स ने फिर से फिल्म को ‘शोले: द फाइनल कट’ के नाम से रिलीज किया है, तो इसमें आपको वो सभी सीन भी देखने को मिलेंगे, जिन्हें उस वक्त सेंसर ने हटवा दिया था। या फिर जिन सीन को मेकर्स ने खुद लंबी अवधि की वजह से हटा दिया था। यही कारण है कि इस बार फिल्म लगभग 19 मिनट लंबी हो गई है। पहले जहां शोले की अवधि 190 मिनट यानी लगभग 3 घंटे 10 मिनट की थी। वहीं अब ये बढ़कर 209.05 मिनट यानी 3 घंटे 29 मिनट और 5 सेकंड हो गई है। इस बार जिन सीन में बदलाव हुआ है उनमें रहीम चाचा (एके हंगल) के बेटे अहमद (सचिन पिलगांवकर) के मारने का सीन शामिल है। फाइनल कट में दिखाया गया है कि कैसे अहमद को गब्बर गर्म तलवार से जला-जलाकर मारता है। रिलीज के वक्त सेंसर ने इस सीन को भी अत्यधिक हिंसक बताते हुए हटवा दिया था। इसके अलावा इस बार फिल्म का क्लाईमैक्स बदला है। इस बार वो क्लाईमैक्स है, जो सलीम-जावेद ने लिखा था। यानी फाइनल कट में ठाकुर गब्बर को पुलिस के हवाले न करके अपनी कील वाले जूतों से मार-मारकर जान से मार देता है।
