Thursday, 29 October 2026 | 10:38 AM
संपादकीय

हार देखना भी लोकतंत्र की परीक्षा है: वोट से लेकर संस्थाओं तक जवाबदेही के सवाल

सुबह की चाय पर कुछ कड़वे सवाल। चुनाव में हार स्वीकार करने से लेकर मतदाता-सूची की पारदर्शिता, सत्ता की जवाबदेही और चेतावनियों को गंभीरता से लेने तक—यह टिप्पणी लोकतंत्र में नागरिक, संस्थाओं और सार्वजनिक जिम्मेदारी के रिश्ते पर विचार करती है।
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हार देखना भी लोकतंत्र की परीक्षा है: वोट से लेकर संस्थाओं तक जवाबदेही के सवाल
हार देखना भी लोकतंत्र की परीक्षा है
सुबह की चाय पर तीन बातें। लंबी नहीं, पर कड़वी।
पहली। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के नतीजे आ रहे हैं। यह वह चुनाव है जिसमें सिर्फ़ स्नातक और शिक्षक वोट देते हैं, यानी वह तबका जो बाकी देश को पढ़ाता है। भाजपा ने चार सीटें जीतीं, और वाराणसी की शिक्षक सीट सपा ने। प्रधानमंत्री के शहर के मास्टर साहब ने अलग राय दी। इसे मैं ज़्यादा नहीं खींचूँगा, क्योंकि शिक्षक की राय शिक्षक की होती है, किसी पार्टी की नहीं। पर आगरा की ख़बर पढ़िए। सुबह पाँच बजे, जब सपा उम्मीदवार तीन हज़ार छह सौ अट्ठानवे वोटों से आगे था, भाजपा उम्मीदवार गिनती छोड़कर चला गया। यह बात कितनी छोटी है, और कितनी बड़ी। लोकतंत्र में हारना नहीं, हार देखना असली इम्तिहान है। जो पाँच बजे उठकर चला जाए, वह अपने वोटरों को यह बता रहा है कि गिनती तभी देखने लायक है जब नतीजा मन का हो। इसी भाव को जब कोई संस्था अपना लेती है तो वह हलफ़नामे में "सर्वसम्मति" लिखने लगती है।
दूसरी। कल जनगणना को लेकर एक ख़बर आई। सरकार ने तय किया कि अगर आँकड़े लीक हुए तो अफ़सर नपेंगे, हर दस्तावेज़ का हिसाब देना होगा। बहुत अच्छा। आँकड़ों की पवित्रता पर मुझे कोई आपत्ति नहीं। बस मेरी एक छोटी-सी उलझन है। जनगणना के आँकड़े लीक हों तो अफ़सर जवाबदेह, पर मतदाता-सूची से तेरह करोड़ नाम काटने वाले सॉफ़्टवेयर का नाम पूछो तो "ट्रेड सीक्रेट"। आँकड़ा बाहर जाए तो अपराध, नाम बाहर जाए तो प्रक्रिया। इस देश में काग़ज़ की सुरक्षा के नियम हैं, नागरिक की सुरक्षा के नियम अभी बन रहे हैं। और आज सर्वोच्च न्यायालय में दिल्ली की मतदाता-सूची पर सुनवाई है। देखिए, वहाँ "ट्रेड सीक्रेट" कितनी देर टिकता है।
तीसरी। इज़राइल के एग्ज़िट पोल में नेतन्याहू को झटका। जो आदमी सत्रह साल से उस देश की राजनीति का केंद्र है, जिसने युद्ध लड़े, जिस पर भ्रष्टाचार के मुक़दमे चल रहे हैं, जिसने अदालत की ताक़त घटाने की कोशिश की, उसे उसकी ही जनता ने शायद घर भेज दिया। मैं नेतन्याहू का प्रशंसक नहीं हूँ, पर उस व्यवस्था का प्रशंसक हूँ जिसमें सबसे ताक़तवर आदमी को भी एक मंगलवार की शाम डर लगता है। जिस देश में प्रधानमंत्री को चुनाव की रात नींद न आए, वहाँ लोकतंत्र ज़िंदा है। जहाँ उसे आराम से नींद आ जाए, वहाँ सवाल पूछना चाहिए कि उसे इतना भरोसा किस पर है, जनता पर या सूची पर।
एक छोटी ख़बर और, जो मुझे सबसे अच्छी लगी। रेलवे ने रात ग्यारह से सुबह पाँच तक ट्रेनों में मोबाइल चार्जिंग बंद कर दी, आग से बचाव के लिए। यानी व्यवस्था चाहे तो रात में भी सोचती है, नियम बनाती है, लागू करती है। बस यह सोच मोबाइल के सॉकेट तक पहुँची है, मतदाता-सूची के सॉकेट तक नहीं।
और समुद्र से। चक्रवात अर्णब आंध्र के तट से टकरा गया है, ओडिशा की ओर बढ़ रहा है, मंदारमणि में तीन पर्यटक डूबे, एक की मौत। चेतावनी थी, फिर भी लोग समुद्र में उतरे। यह आदत हमारी राष्ट्रीय है, चेतावनी को मौसम की ख़बर समझना, चाहे वह तूफ़ान की हो या संस्थाओं की।
पराजय को स्वीकार करने की क्षमता ही चरित्र की पहली परीक्षा है। आगरा के उस उम्मीदवार से लेकर दिल्ली की उस संस्था तक, आज यह परीक्षा कई जगह चल रही है। जो पाँच बजे उठकर नहीं जाता, वही अगली बार जीतने का हक़दार है।
आपने कभी किसी को हार देखते हुए देखा है, आख़िरी वोट तक? वह आदमी कैसा था, बताइए।