जनप्रतिनिधि बनाम ब्यूरोक्रेट(जनसेवक) : भारतीय व्यवस्था में वास्तविक सर्वोच्चता किसकी?

आजकल लोगों के बीच यह चर्चा आम हो गई है कि एक ब्यूरोक्रेट (IAS, IPS एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारी) एक जनप्रतिनिधि (विधायक, सांसद आदि) से बड़ा होता है। यह धारणा केवल एक सामान्य भ्रम नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे समाज के भीतर ऐसी मानसिकता विकसित कर रही है जो जनता और उसके प्रतिनिधियों की वास्तविक शक्ति को कमजोर करती है।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह समझना आवश्यक है कि ब्यूरोक्रेट और जनप्रतिनिधि की भूमिका अलग-अलग है। एक ब्यूरोक्रेट मूलतः एक जनसेवक होता है, जिसकी नियुक्ति जनता की सेवा, प्रशासनिक कार्यों के संचालन तथा जनहित की योजनाओं को लागू करने के लिए की जाती है। दूसरी ओर, एक जनप्रतिनिधि सीधे जनता के मत से चुना जाता है और वह लाखों लोगों की आकांक्षाओं, समस्याओं और अधिकारों का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि उसे “जनप्रतिनिधि” कहा जाता है।

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपने अधिकारों का प्रयोग करके अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वही प्रतिनिधि शासन व्यवस्था को दिशा देते हैं। ब्यूरोक्रेट्स इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग अवश्य हैं, लेकिन उनका दायित्व नीति बनाना नहीं बल्कि नीतियों को लागू करना और प्रशासनिक तंत्र को संचालित करना है। इसलिए लोकतांत्रिक दृष्टि से देखा जाए तो जनसेवक और जनप्रतिनिधि के बीच का संबंध स्वामी और सेवक का नहीं, बल्कि जनता की इच्छा और उसके क्रियान्वयन का संबंध है। फिर भी जनप्रतिनिधि की वैधता सीधे जनता से आती है, जबकि ब्यूरोक्रेट की वैधता नियुक्ति प्रक्रिया से प्राप्त होती है।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब जनता स्वयं अपनी शक्ति को भूल जाती है। जब लोग यह मानने लगते हैं कि कुछ प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर लेने वाला व्यक्ति ही शासन का वास्तविक मालिक है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।

प्रशासनिक अधिकारियों का ज्ञान, योग्यता और अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन वह उन्हें जनता से ऊपर नहीं बना देता। उनकी भूमिका जनता की सेवा करना है, जनता पर शासन करना नहीं।
समय के साथ समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा बन गई है कि ब्यूरोक्रेट ही अंतिम निर्णयकर्ता हैं और जनप्रतिनिधि केवल औपचारिक पदाधिकारी हैं। यही सोच प्रशासनिक तंत्र को आवश्यकता से अधिक शक्तिशाली और जनता को आवश्यकता से अधिक निर्भर बना देती है। परिणामस्वरूप जिन अधिकारियों को जनसमस्याओं के समाधान के लिए नियुक्त किया गया था, वे कई बार स्वयं को जनता और उसके प्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं मानी जा सकती।

यह भी विचारणीय है कि किसी अधिकारी का पद उसके ज्ञान, प्रशिक्षण और प्रशासनिक दक्षता का प्रतीक हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक वैधता का स्रोत नहीं। लोकतांत्रिक वैधता जनता के विश्वास और मत से प्राप्त होती है। एक विधायक या सांसद केवल एक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि अपने क्षेत्र की लाखों आवाज़ों का प्रतिनिधि होता है। इसलिए उसके पद का महत्व उसके व्यक्तिगत गुणों से नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़ी जनता की सामूहिक शक्ति से निर्धारित होता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जनता अपने अधिकारों और अपनी वास्तविक स्थिति को समझे। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि उसी सर्वोच्चता का संवैधानिक स्वरूप हैं। प्रशासनिक अधिकारी लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ हैं, लेकिन वे लोकतंत्र के स्वामी नहीं हैं। यदि जनता अपनी शक्ति को भूल जाएगी तो स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक तंत्र प्रभावी होता जाएगा और जनसत्ता केवल एक औपचारिक अवधारणा बनकर रह जाएगी।

इसलिए देश के जनों और जनप्रतिनिधियों को अपने संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक स्थान को समझना होगा। उन्हें यह स्मरण रखना होगा कि लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति जनता के पास होती है और जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व उसके चुने हुए जनप्रतिनिधि करते हैं। प्रशासन का उद्देश्य जनता की सेवा करना है, न कि जनता पर आधिपत्य स्थापित करना।

एड.अलप भाई पटेल
हाईकोर्ट,इलाहाबाद
9455335575, 6392903754

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