शिक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद ही विकसित भारत की असली आधारशिला
— रामनरेश प्रजापति पत्रकार, स्वर्ण पदक विजेता, जनसंचार एवं पत्रकारिता वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर।
“जब देश का युवा अपने भविष्य की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा के साथ अपनी आवाज बुलंद करने को विवश हो जाए, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा शक्ति होती है। यदि वही युवा अपनी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के लिए गंभीर चेतावनी है।”
देश के किसी छोटे शहर, कस्बे या गांव का एक विद्यार्थी वर्षों तक सीमित संसाधनों में रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। उसके माता-पिता अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके उसकी शिक्षा का खर्च उठाते हैं और उस एक परीक्षा को अपने परिवार की उम्मीदों और भविष्य का आधार मानते हैं। ऐसे में जब परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल एक विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों और विश्वास से जुड़ जाता है।
भारत केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की वह भूमि है जिसने विश्व को दर्शन, अध्यात्म, योग, आयुर्वेद, गणित, विज्ञान, साहित्य और मानवता का संदेश दिया। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी गौरवशाली ज्ञान परंपरा के प्रतीक रहे हैं। इसी विरासत के कारण भारत को विश्वगुरु कहा गया। लेकिन इतिहास का गौरव तभी सार्थक होगा, जब वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था भी मजबूत, पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय हो।
आज विकसित भारत और विश्वगुरु भारत का संकल्प देश के सामने है। यह लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सर्वोच्च आधार बनाया जाए। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी युवा प्रतिभा में निहित है और इस प्रतिभा को सही दिशा देने के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था आवश्यक है, जिसमें समान अवसर, निष्पक्ष मूल्यांकन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी हो।
एक विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है। उसके माता-पिता अपनी क्षमता से अधिक त्याग करते हैं। इसलिए परीक्षा प्रणाली केवल प्रश्नपत्र, परीक्षा और परिणाम तक सीमित विषय नहीं रहती, बल्कि करोड़ों परिवारों के विश्वास और भविष्य से जुड़ जाती है। यदि प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को निष्पक्ष अवसर नहीं मिलेगा, तो इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन पर नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति पर भी पड़ेगा।
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) के बढ़ते दायरे से इस चुनौती को समझा जा सकता है। वर्ष 2014 में जहां लगभग 5.24 लाख अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हुए थे, वहीं हाल के वर्षों में यह संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। वर्ष 2024 में लगभग 23.33 लाख और वर्ष 2026 में 22,05,035 अभ्यर्थियों ने परीक्षा में भाग लिया। यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं से लाखों विद्यार्थियों और परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। इसलिए परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा, पारदर्शिता और विश्वसनीयता अत्यंत आवश्यक है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि जनता की बात सुनना, समस्याओं का समाधान करना और संवाद स्थापित करना भी होता है। विशेष रूप से जब विषय युवाओं के भविष्य से जुड़ा हो, तब सरकार, विपक्ष, शिक्षा विशेषज्ञ, विश्वविद्यालय, न्यायपालिका और समाज सभी की जिम्मेदारी बनती है कि वे मिलकर समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।
हाल के छात्र आंदोलनों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को जन्म दिया। शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्न संसद तक पहुंचे। विभिन्न विपक्षी नेताओं ने इन विषयों को उठाया। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कुछ नेताओं को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने लोकतांत्रिक विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन पर बहस को भी जन्म दिया।
किसी भी लोकतांत्रिक देश की वास्तविक शक्ति उसकी आम जनता होती है। लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं, बल्कि सत्ता की सबसे बड़ी आधारशिला होती है। कोई भी सरकार जनता के विश्वास और समर्थन से ही मजबूत होती है। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों का दायित्व है कि वे जनता की आवाज सुनें, अपनी नीतियों के प्रति जवाबदेह रहें और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करें। लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, बल्कि जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि किसी भी सरकार में अहंकार, जनभावनाओं की उपेक्षा या जवाबदेही का अभाव बढ़ता है, तो जनता अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए चुनाव के माध्यम से अपना निर्णय देने में सक्षम होती है। मताधिकार लोकतंत्र का वह सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा जनता शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से सत्ता का मूल्यांकन और आवश्यकता पड़ने पर परिवर्तन भी कर सकती है।
लोकतंत्र में सरकार का दायित्व व्यवस्था बनाए रखते हुए समाधान प्रस्तुत करना है, वहीं विपक्ष की भूमिका जनता की चिंताओं को लोकतांत्रिक मंचों तक पहुंचाना है। शिक्षा जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर टकराव के बजाय सार्थक संवाद और संस्थागत सुधार की आवश्यकता है।
भारत का युवा केवल रोजगार नहीं चाहता, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन ईमानदारी से हो और सफलता योग्यता के आधार पर तय हो। इसलिए आवश्यकता केवल परीक्षाएँ आयोजित करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जिस पर विद्यार्थी और अभिभावक पूर्ण विश्वास कर सकें।
इसके लिए सुरक्षित डिजिटल प्रणाली, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था, समयबद्ध परिणाम, पारदर्शी मूल्यांकन, आधुनिक साइबर सुरक्षा और दोषियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई जैसे कदम आवश्यक हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक तकनीक का उपयोग परीक्षा व्यवस्था को और अधिक सुरक्षित एवं विश्वसनीय बना सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भी भारत को ज्ञान आधारित वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने की परिकल्पना प्रस्तुत करती है। इसमें समग्र शिक्षा, कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार, बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में शिक्षण और डिजिटल शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। आवश्यकता है कि इन उद्देश्यों को प्रभावी क्रियान्वयन और जवाबदेही के साथ धरातल पर उतारा जाए।
यह मेरा व्यक्तिगत मत है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ में समय-समय पर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, युवाओं की अपेक्षाओं, अनुसंधान और नवाचार जैसे विषयों पर संवाद करें। इससे युवाओं में विश्वास और सहभागिता मजबूत होगी। साथ ही सभी संवैधानिक संस्थाओं, सरकारों, शिक्षा विशेषज्ञों और समाज को मिलकर शिक्षा सुधार को राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए।
भारत को यदि वास्तविक अर्थों में विश्वगुरु बनना है, तो सबसे पहले शिक्षा को राष्ट्र निर्माण के केंद्र में स्थापित करना होगा। विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल आर्थिक शक्ति बनना नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, तकनीक, नवाचार, नैतिकता और मानवीय मूल्यों में विश्व का मार्गदर्शन करना है।
भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति है। इस शक्ति को सही दिशा देने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष अवसर और विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था मिले। युवाओं के सपनों की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का राष्ट्रीय दायित्व है।
जब शिक्षा व्यवस्था में विश्वास मजबूत होगा, तब युवा आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ेगा; जब युवा अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर आगे बढ़ेगा, तब राष्ट्र की प्रगति को नई गति मिलेगी। शिक्षा में विश्वास, परीक्षा में पारदर्शिता और लोकतंत्र में संवाद ही विकसित भारत की सबसे मजबूत आधारशिला है। यही समय की पुकार है और यही राष्ट्रहित का मार्ग भी है।
