RSF के आकलन में भारत के राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग संकेतकों को शामिल किया जाता है। 2026 में भारत का Security Indicator 158वें स्थान पर रहा। RSF ने पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, स्वतंत्र मीडिया पर दबाव, न्यायिक उत्पीड़न और मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों को भारत की प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति से जोड़कर रेखांकित किया है।

पत्रकारों की सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रेस की स्वतंत्रता केवल अखबार, टीवी या डिजिटल मीडिया को खबर प्रकाशित करने की आजादी देने तक सीमित नहीं है। पत्रकार यदि किसी घटना की रिपोर्टिंग करते समय हमले, धमकी, हिरासत, कानूनी दबाव या ऑनलाइन उत्पीड़न के डर में काम करे, तो इसका असर स्वतंत्र पत्रकारिता पर पड़ सकता है।
RSF ने 2026 में भारत में महिला पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन उत्पीड़न और धमकी को भी गंभीर चिंता का विषय बताया है। संगठन के अनुसार, महिला पत्रकारों को विशेष रूप से सोशल मीडिया पर लैंगिक आधार पर अपमान, धमकियों और संगठित ऑनलाइन हमलों का सामना करना पड़ता है।
दिल्ली में महिला पत्रकारों से जुड़ी हालिया घटना
सितंबर 2026 में दिल्ली के साकेत इलाके में दो महिला पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान से जुड़ा मामला सामने आया। दोनों 4PM News Network से जुड़ी पत्रकार हैं और एक कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंची थीं।
पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके धर्म को लेकर सवाल किए गए और उसके बाद उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। घटना के बाद उनके शरीर पर चोट के निशान दिखाई देने वाले वीडियो भी सामने आए।
हालांकि दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है। पुलिस के अनुसार दोनों पत्रकारों को VVIP रूट में व्यवधान और पुलिस के निर्देशों का पालन नहीं करने के कारण हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने मारपीट तथा धार्मिक आधार पर कार्रवाई के आरोपों को गलत और भ्रामक बताया। इसलिए इस मामले में लगाए गए आरोपों और पुलिस के पक्ष को अलग-अलग देखना जरूरी है।YouTube Video
फरवरी में भी महिला पत्रकार से जुड़ा मामला
इससे पहले फरवरी 2026 में दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में छात्रों के प्रदर्शन की कवरेज कर रही एक महिला पत्रकार पर कथित शारीरिक और यौन हमले का मामला सामने आया था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर मामले पर रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट के अनुसार पत्रकार ने आरोप लगाया था कि उनकी पहचान/जाति को लेकर पूछताछ के बाद उन्हें निशाना बनाया गया।
ये घटनाएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि मैदानी स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है, खासकर तब जब पत्रकार संवेदनशील राजनीतिक, सामाजिक या विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहे हों।
प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ मीडिया संस्थानों का मुद्दा नहीं
हाल ही में दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग को लेकर भी RSF ने कई तरह की पाबंदियों का उल्लेख किया। संगठन के अनुसार कुछ पत्रकारों को इंटरनेट बाधित होने, संचार में रुकावट, निगरानी और सोशल मीडिया पर पत्रकारिता से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो हटाए जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। RSF ने इन घटनाओं को पत्रकारों के लिए सूचना एकत्र करने और घटनास्थल से तत्काल रिपोर्टिंग करने में बाधा के रूप में देखा।
रैंकिंग से आगे की बहस
भारत की 157वीं रैंकिंग अपने आप में पूरी तस्वीर नहीं बताती। प्रेस स्वतंत्रता को समझने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा, मीडिया की आर्थिक स्वतंत्रता, कानूनी वातावरण, राजनीतिक दबाव, डिजिटल सेंसरशिप, मीडिया स्वामित्व और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा जैसे कई पहलुओं को देखना पड़ता है।
लोकतंत्र में पत्रकार जनता और सत्ता के बीच सूचना का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। इसलिए किसी पत्रकार पर हमला केवल उस व्यक्ति की सुरक्षा का मामला नहीं है; इससे जनता तक स्वतंत्र और तथ्यात्मक सूचना पहुंचने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
भारत की प्रेस स्वतंत्रता पर बहस करते समय जरूरी है कि सरकार, पुलिस, मीडिया संस्थान और पत्रकार संगठन—सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करें। पत्रकारों को भी तथ्यात्मक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग करनी चाहिए, जबकि उनके काम में बाधा, हिंसा या धमकी के मामलों में निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।