Sunday, 01 November 2026 | 3:25 PM
संपादकीय

देश दौड़ रहा है, लेकिन सरदार पटेल का स्टील फ़्रेम कहाँ है

राष्ट्रीय एकता दिवस पर पूरा देश अलग-अलग दिशाओं में दौड़ता दिखाई दे रहा है। कहीं निर्वाचन आयोग मतदाता सूची से जुड़े सवालों के घेरे में है, कहीं एक युवा कार्यकर्ता की नागरिकता पर सवाल उठ रहे हैं, तो कहीं दिल्ली की फैक्ट्री में मजदूरों की जान जा रही है और उत्तर प्रदेश का जिला अस्पताल बदहाली से जूझ रहा है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रशासनिक अधिकारियों को देश का 'स्टील फ़्रेम' कहा था। आज सवाल है कि वह स्टील फ़्रेम कहाँ है? क्या प्रशासन सत्ता को खुश करने में लगा है या नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?
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देश दौड़ रहा है, लेकिन सरदार पटेल का स्टील फ़्रेम कहाँ है
सरदार पटेल का स्टील फ़्रेम कहाँ खो गया?
आज सरदार पटेल की जयंती है, राष्ट्रीय एकता दिवस। सुबह दिल्ली में "रन फ़ॉर यूनिटी" हुई। मैं भी दौड़ में शामिल हुआ, बस मैदान में नहीं, अख़बार में। और मैंने देखा कि आज पूरा देश दौड़ रहा है। बस सब अलग-अलग चीज़ से दूर दौड़ रहे हैं।
सबसे आगे निर्वाचन आयोग दौड़ रहा है। कल सर्वोच्च न्यायालय ने उससे कहा कि उत्तर प्रदेश में फ़र्ज़ी फ़ॉर्म सात की जाँच करो। फ़ॉर्म सात वही है जिससे किसी का नाम मतदाता-सूची से कटवाया जाता है। सोलह लाख आपत्तियाँ, अधिकतर उन नामों पर जो विधिवत जुड़े थे, और आयोग एक महीने से नहीं बता पाया कि भरीं किसने। अब अदालत ने कहा है, पता करो। आयोग दौड़ रहा है, पर यह दौड़ जाँच की ओर नहीं है, जाँच से दूर है। सॉफ़्टवेयर का नाम अब भी ट्रेड सीक्रेट है। इस दौड़ में आयोग अकेला नहीं है, उसके साथ उसका हलफ़नामा भी दौड़ रहा है, जिसमें लिखा था कि सब सर्वसम्मति से हुआ।

दूसरे नंबर पर मद्रास उच्च न्यायालय की एक याचिका दौड़ रही है। जिस युवा कार्यकर्ता ने जंतर-मंतर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त का इस्तीफ़ा माँगा और सात दिन तिहाड़ काटे, अब उसकी नागरिकता और पहचान की जाँच की माँग पर अदालत ने नोटिस जारी किया है। ध्यान दीजिए क्रम पर। पहले उसने पूछा कि नाम किसने काटे। फिर उसे जेल हुई। अब पूछा जा रहा है कि वह ख़ुद भारतीय है या नहीं। इस देश में सवाल पूछने की सज़ा का अगला चरण यह है कि आपके सवाल से पहले आपके जन्म की जाँच होगी। एकता दिवस पर यह ख़बर इसलिए याद रखिए कि सरदार पटेल ने पाँच सौ पैंसठ रियासतों को एक देश बनाया था, और आज वह देश एक नागरिक से पूछ रहा है कि तुम इसमें हो भी या नहीं।

तीसरे नंबर पर मंगोलपुरी की जूता फ़ैक्टरी के मालिक दौड़ रहे हैं। कल रात आग लगी, चार मज़दूर मरे, बीस दमकल गाड़ियाँ पहुँचीं। हर साल दिवाली से पहले दिल्ली की किसी न किसी अवैध फ़ैक्टरी में यही होता है। लाइसेंस कौन देता है, निरीक्षण कौन करता है, यह सवाल हर साल आग के साथ जलकर राख हो जाता है। मालिक दौड़ रहे हैं, अफ़सर फ़ाइल की ओर दौड़ रहे हैं, और मज़दूर कहीं नहीं दौड़ रहे, क्योंकि चार तो अब दौड़ ही नहीं सकते।
चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश का चुनाव दौड़ रहा है, जो अभी एक साल दूर है पर कल लखनऊ में शुरू हो गया। गृह मंत्री ने कहा, तीसरी बार सरकार बनी तो समान नागरिक संहिता लागू होगी। और उसी सुबह अख़बार में सुर्ख़ी है कि पाकिस्तान तुर्किये के नेटवर्क से यूपी चुनाव प्रभावित करने की साज़िश कर रहा है। यानी चुनाव से एक साल पहले ही तय हो गया कि अगर नतीजा मन का नहीं आया तो वजह सरहद पार होगी। फ़र्ज़ी फ़ॉर्म सात घर में भरे गए, पर साज़िश विदेश से आ रही है। इस दौड़ में सबसे तेज़ कहानी दौड़ रही है और
पाँचवें नंबर पर मऊ का ज़िला अस्पताल है, जहाँ ओपीडी तीस प्रतिशत पर सिमट गई है। यह ख़बर अख़बार के भीतरी पन्ने पर दो कॉलम में है। यह दौड़ नहीं रहा। यह थक कर बैठ गया है। मरीज़ दौड़ रहे हैं, निजी अस्पताल की ओर।
अब सरदार पटेल की बात, क्योंकि दिन उनका है।
1947 में उन्होंने मेटकाफ़ हाउस में आईसीएस के पहले भारतीय बैच से कहा था कि आप इस देश का "स्टील फ़्रेम" हैं, और आपका पहला कर्तव्य है कि अपने राजनीतिक मालिक को वह सलाह दो जो सही है, चाहे उसे पसंद आए या न आए। उन्होंने यह भी कहा था कि जो अफ़सर मंत्री को ख़ुश करने के लिए सच छिपाता है, वह देश के साथ विश्वासघात करता है। उनकी मूर्ति आज दुनिया में सबसे ऊँची है, एक सौ बयासी मीटर। और उनका यह वाक्य आज सबसे नीचे दबा हुआ है, किसी हलफ़नामे के नीचे, किसी ट्रेड सीक्रेट के नीचे, किसी "सर्वसम्मति" के नीचे।
एकता दिवस पर मेरा सवाल सीधा है। जिस स्टील फ़्रेम की बात सरदार ने की थी, वह आज कहाँ है? वह आयोग में बैठा है और सॉफ़्टवेयर का नाम छिपा रहा है। वह फ़ैक्टरी का निरीक्षण नहीं कर रहा। वह मऊ के अस्पताल में डॉक्टर नहीं भेज रहा। वह सूची से नाम कटने पर नागरिक से उसका जन्म-प्रमाण माँग रहा है। स्टील फ़्रेम वहीं है, बस उसमें जंग नहीं लगा, उसे मोड़ दिया गया है।
एकता भीड़ का नाम नहीं, विवेक का नाम है, क्योंकि भीड़ तो गलत के लिए भी जुट जाती है। आज देश एक है, इसमें कोई शक नहीं। सवाल यह है कि किस बात पर एक है। सवाल पूछने वाले को जेल, नाम काटने वाले को गोपनीयता, मज़दूर को आग, और सबको एक दौड़। यह एकता है, या एक दिशा में हाँका जाना?
सरदार होते तो आज किससे पूछते? मुझे लगता है, सबसे पहले अपने स्टील फ़्रेम से। आपको क्या लगता है?