Thursday, 22 October 2026 | 4:19 AM
राजनीति

रामराज्य नारा नहीं, कसौटी है: रावण दहन के बाद उठे स

यह संपादकीय रामराज्य की अवधारणा को सत्ता, जनकल्याण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कसौटी पर परखता है। रामायण के धोबी प्रसंग के माध्यम से यह सवाल उठाया गया है कि क्या लोकतंत्र में आम नागरिक को सत्ता से सवाल पूछने का निर्भय अधिकार प्राप्त है। रावण दहन के उत्सव, सुरक्षा व्यवस्था और तिहाड़ में बंद युवाओं के संदर्भ में लेख का केंद्रीय तर्क है कि रामराज्य की असली पहचान केवल बुराई पर विजय नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ सुनने वाली सत्ता है।
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रामराज्य नारा नहीं, कसौटी है: रावण दहन के बाद उठे स

रामराज्य नारा नहीं, कसौटी है: रावण दहन के बाद उठे सवाल

प्रधानमंत्री के जनकल्याण के संदेश के बीच रामायण के धोबी प्रसंग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तिहाड़ में बंद युवाओं का सवाल—क्या सत्ता जनता की आवाज़ सुनने को तैयार है?

लेखक: कौशलेंद्र कुमार | श्रेणी: राजनीतिक संपादकीय

विजयादशमी की शाम है। पूर्वी दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन में प्रधानमंत्री ने रावण दहन किया और कहा, “रामराज्य में सत्ता का मतलब जनकल्याण है।” उन्होंने यह भी कहा कि देश के शत्रुओं को पहचानना होगा। वे कितने भी बड़े हों, जीत सत्य की होगी।

दोनों वाक्य सही हैं। और इसीलिए इन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। क्योंकि रामराज्य कोई नारा नहीं है, वह एक कसौटी है। उस कसौटी का सबसे कठिन प्रसंग वह नहीं है, जहाँ राम रावण को मारते हैं। वह है, जहाँ अयोध्या का एक धोबी राजा की आलोचना करता है।

रामराज्य की कसौटी पर राजा भी खड़ा होता है

याद कीजिए। लंका जीतकर राम लौट चुके हैं। राज्याभिषेक हो चुका है, प्रजा प्रसन्न है। तभी एक साधारण धोबी अपनी पत्नी से कहता है कि वह राम नहीं है, जो दूसरे के घर रही स्त्री को स्वीकार कर ले।

यह बात राजा तक पहुँचती है। उस धोबी का क्या हुआ? न उसे उठाया गया, न उससे बंधपत्र भरवाया गया, न उसके मुहल्ले को दंडित किया गया। राम ने उस एक व्यक्ति की बात पर अपना सबसे प्रिय त्याग दिया।

हम आज तक उस फैसले पर बहस करते हैं, और करनी भी चाहिए। लेकिन इस प्रसंग से एक बुनियादी सवाल निकलता है—क्या सत्ता आलोचना सुनने का साहस रखती है?

रामराज्य की परिभाषा उस धोबी ने तय की थी, राजा ने नहीं। वह राज्य जहाँ सबसे नीचे खड़ा आदमी भी राजा के विरुद्ध बोल सके और राजा उसकी बात सुने।

तिहाड़ के बाहर इंतजार और भीतर सवाल

आज उसी शाम दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर दो वकील दोपहर से खड़े थे। सुनवाई का समय बार-बार आगे खिसकता रहा, ऐसा लेख में वर्णित घटनाक्रम बताता है। सौरव दास और आशुतोष रांका आज विजयादशमी की रात भी जेल में हैं।

लेख में उनके सवाल को इन शब्दों में रखा गया है—“तेरह करोड़ नाम कहाँ गए?”

यदि यह सवाल मतदाता सूची में नामों से जुड़ा है, तो उसका उत्तर तथ्यों, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से दिया जाना चाहिए। सवाल पूछने वाले की स्थिति और उसके मामले की वास्तविक जानकारी भी सार्वजनिक विमर्श में उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अयोध्या के धोबी ने अपने समय के राजा से कहीं अधिक निजी और कड़वी बात कही थी। फिर भी रामायण का यह प्रसंग आज हमें याद दिलाता है कि असहमति का उत्तर दमन नहीं, संवाद होना चाहिए।

जब उत्सव में जनता से पहले पास दिखाई देने लगें

उस मैदान को भी देखिए, जहाँ रावण जला। लेख के अनुसार, वहाँ ढाई हजार सुरक्षाकर्मी, ड्रोन, सुरक्षा के तीन घेरे और प्रवेश के लिए पास की व्यवस्था थी।

रावण दहन इस देश में लंबे समय से सार्वजनिक उत्सव रहा है। मैदान में लोग आते हैं, परिवार जुटते हैं और बच्चे बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक देखते हैं। बड़े आयोजनों में सुरक्षा जरूरी है। भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक व्यवस्था को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

लेकिन प्रतीकों पर भी गौर करना चाहिए। जब किसी सार्वजनिक उत्सव में आम जनता की जगह केवल आमंत्रित लोगों की उपस्थिति दिखाई देती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सार्वजनिक जीवन में नागरिक की जगह कितनी बची है।

सुरक्षा व्यवस्था अपने आप में गलत नहीं है। सवाल यह है कि सुरक्षा और सार्वजनिक सहभागिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

रामायण में शत्रु की पहचान का अर्थ

प्रधानमंत्री ने कहा कि शत्रु कितना भी बड़ा हो, उसे पहचानना होगा। यह बात अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन रामायण में सुनने, समझने और मित्रता की भी उतनी ही बड़ी भूमिका है।

राम ने विभीषण की बात सुनी, जो शत्रु के घर से आया था। उन्होंने सुग्रीव को मित्र बनाया, जो अपने भाई से संघर्ष के बाद वन में रह रहा था। उन्होंने शबरी के बेर स्वीकार किए, जो सामाजिक हाशिये पर खड़ी थीं।

इन प्रसंगों का संदेश केवल युद्ध में विजय नहीं है। इनमें संवाद, विश्वास और सामाजिक मर्यादा के प्रश्न भी हैं।

रामराज्य में शत्रु वह नहीं था, जो असहमत था। इस लेख की दृष्टि में असली संकट वह है, जब सत्ता अहंकार में सुनना बंद कर दे।

रावण के दस सिर उसकी शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन उसका पतन उसके अहंकार से जुड़ा था। अनेक सिर होने के बावजूद यदि विवेक और संवाद के लिए जगह न हो, तो शक्ति भी विनाश का कारण बन सकती है।

रावण के पुतले के साथ किस बुराई को जलाना चाहिए?

आज के मैदान में रावण के साथ नकली दवाओं के कालाबाजारियों का पुतला भी जलाया गया। यह एक अच्छा प्रतीक है। नकली दवाएँ लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करती हैं। इनके कारोबार पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन एक और बुराई है, जिसका पुतला जलना चाहिए—जनता के सवालों पर छाई चुप्पी।

यदि तेरह करोड़ नामों का सवाल मतदाता सूची से जुड़ा है, तो संबंधित संस्थाओं को तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। यदि किसी नागरिक ने सवाल पूछा है, तो उसका जवाब उपलब्ध प्रमाणों और कानून के आधार पर दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी सवाल का महत्व इस बात से तय नहीं होता कि उसे कौन पूछ रहा है, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसके पीछे कौन-सा तथ्य और कौन-सी जनचिंता है।

जनकल्याण केवल योजनाओं की घोषणा नहीं है। इसमें जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिकों के प्रति सम्मान भी शामिल हैं।

प्रधानमंत्री के ही शब्दों में, यदि सत्ता का मतलब जनकल्याण है, तो जनता के सवाल का उत्तर देना भी उसी कल्याण का हिस्सा है।

रामराज्य लौटेगा, तो सबसे पहले निर्भय आवाज़ लौटेगी

रामराज्य की कल्पना को केवल धार्मिक प्रतीक या राजनीतिक नारे तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसकी असली परीक्षा यह है कि समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित है, सबसे साधारण नागरिक कितना सुना जाता है और सत्ता से सवाल पूछने वाला कितना निर्भय है।

जब तक अयोध्या का हर धोबी निर्भय होकर बोल न सके, तब तक राम लौटे हों तो भी रामराज्य नहीं लौटा।

आज रात रावण की राख ठंडी हो जाएगी। उत्सव समाप्त होगा। आमंत्रित लोग अपने घर लौट जाएँगे। लेकिन एक सवाल बचा रहेगा, जो आज के भाषण से ही निकला है।

अगर रामराज्य में सत्ता का मतलब जनकल्याण है, तो उस नागरिक का क्या, जो आज तिहाड़ में बैठा है और सत्ता से सवाल पूछना चाहता है?

विजयादशमी की शुभकामनाएँ—सबके लिए।