Tuesday, 15 September 2026 | 11:13 AM
भारत

राहुल को अभी पुराने दिग्गजों में ही तलाशना होगा नया संकटमोचक, जानें कांग्रेस में कौन है बेहतर विकल्प

अपने सियासी चाणक्य को गंवा कर दोराहे पर खड़ी कांग्रेस में सवाल खड़ा हो गया है कि अहमद पटेल के बाद पार्टी के चौतरफा संकट को कौन थामेगा? पार्टी में सीनियर और जूनियर नेताओं के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बीच हकीकत यह भी है कि फिलहाल कांग्रेस की नई पीढ़ी में ऐसे प्रभावशाली चेहरे दिखाई नहीं दे रहे
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अपने सियासी चाणक्य को गंवा कर दोराहे पर खड़ी कांग्रेस में सवाल खड़ा हो गया है कि अहमद पटेल के बाद पार्टी के चौतरफा संकट को कौन थामेगा? पार्टी में सीनियर और जूनियर नेताओं के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बीच हकीकत यह भी है कि फिलहाल कांग्रेस की नई पीढ़ी में ऐसे प्रभावशाली चेहरे दिखाई नहीं दे रहे जो संकटमोचक भी भूमिका निभाने के लिए मुफीद हों। ऐसे में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अभी कुछ समय तक वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों पर ही भरोसा करने का विकल्प अपनाना पड़ सकता है।
सूत्रों की मानें तो पार्टी में जारी अंदरूनी घमासान के बीच अगले साल की शुरुआत में राहुल गांधी दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बन सकते हैं। ऐसे में अहमद पटेल के निधन से पार्टी के ध्वस्त हो गए राजनीतिक और आर्थिक प्रबंधन के संस्थागत ढांचे के साथ विपक्षी पार्टियों को साधने वाले पार्टी के चेहरे कौन होंगे इसका फैसला अब राहुल ही करेंगे। सोनिया गांधी की भूमिका इसमें सलाहकार की रहेगी। इस लिहाज से राहुल के पास नई पीढ़ी के अपनी पसंद के नेताओं को इस भूमिका में लाने का विकल्प है।
हालांकि कांग्रेस की मौजूदा अंदरूनी कलह राहुल को इस विकल्प को आजमाने की शायद ही गुंजाइश दे। पार्टी के मौजूदा हालात से साफ है कि पेशेवर पृष्ठभूमि से आए नए चेहरे कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय और प्रबंधन को भले ही संभाल ले मगर पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से लेकर सियासी रणनीति को अंजाम देने की एक सीमाएं हैं। खासकर तब जब कांग्रेस का मुकाबला अटल आडवाणी के पुराने दौर की भाजपा से नहीं वरन मोदी-शाह के नए दौर की भाजपा से है। ऐसे में नेतृत्व के प्रति निष्ठा, अनुभव और नतीजे देने की क्षमता की कसौटी पर ही नए संकटमोचक की तलाश होगी।
ऐसे में अपनी टीम के भरोसेमंद चेहरों के साथ राहुल को पुराने दिग्गजों में से ही अलग-अलग भूमिकाओं के संकटमोचक तलाशने होंगे। इस लिहाज से सबसे पहले नंबर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का है मगर वे सूबे की कमान छोड़ेंगे इसमें संदेह है। पुराने दिग्गज पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी पार्टी के सीनियर-जूनियर के बीच संतुलन बनाने के लिए एक प्रमुख विकल्प हैं। पार्टी का कोषाध्यक्ष चाहे जो भी बन जाए मगर मौजूदा दौर में कांग्रेस की आर्थिक फंडिंग की मुश्किलों को कम करने में पी. चिदंबरम ही अहम भूमिका निभा सकते हैं।
राजनीतिक मसलों पर वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह सबसे कारगर हो सकते हैं। सबसे लंबे समय से पार्टी महासचिव पद पर कायम मुकुल वासनिक और मल्लिकार्जुन खड़गे भी इस सूची से बाहर नहीं हैं। लेकिन पत्र विवाद से जुड़े समूह 23 के नेताओं के लिए इन भूमिकाओं में आने का रास्ता अब शायद ही बचा है। हालांकि क्षमता और कद के लिहाज से पटेल की भूमिका को गुलाम नबी आजाद सबसे बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं। मगर इसकी गुंजाइश तभी बनेगी जब आजाद विद्रोही तेवर छोड़ें और हाईकमान भी अपना रुख नरम कर ले।

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आदर्श कुमार

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