शाक्यों का एक समूह मोरों वाले जंगल मे रहता था। जहां के राजा विशालगुप्त थे। मोरों वाले जंगल मे रहने के कारण उन्हे मोरिय राजा कहा जाता था। उनके पुत्र सूर्यगुप्त मोर्य प्रतापी राजा हुए।जिन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र विष्णुगुप्त मोर्य को पढने विश्वविद्यालय भेज दिया था जो चाणक्य की डिग्री प्राप्त करके जब
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P.Vinod Maurya
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Published
24 August 2025, 12:17 PM
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शाक्यों का एक समूह मोरों वाले जंगल मे रहता था। जहां के राजा विशालगुप्त थे। मोरों वाले जंगल मे रहने के कारण उन्हे मोरिय राजा कहा जाता था। उनके पुत्र सूर्यगुप्त मोर्य प्रतापी राजा हुए।जिन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र विष्णुगुप्त मोर्य को पढने विश्वविद्यालय भेज दिया था जो चाणक्य की डिग्री प्राप्त करके जब वापस आये तब तक उनके पिता राजा सूर्यगुप्त मोर्य एवं उनके परिवार की छल पूर्वक हत्या करके उनका सेनापति राजा बन गया था। माता मूरा को उनकी दासी बचाकर अपने घर ले गयी वहीं चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ।
वहां से रानी मूरा पकड़ी गयी और उन्हे दासी बना लिया गया। चन्द्रगुप्त को मूरा की दासी ने अपना पुत्र बताकर बचा लिया था। वहीं पर वह पले-बड़े। उन्हीं के पशु चराते समय जंगल मे अपने साथी ग्वालाओं के साथ राजा का नाटक करते हुए, चाणक्य से चन्द्रगुप्त की भेंट हुई।चाणक्य ने चन्द्रगुप्त की प्रतिभा देखकर उनके पालक से भेंट की। सब जानने के बाद वे चन्द्रगुप्त को अपने साथ ले गये। पढाया-लिखाया और चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाकर अखण्ड भारत का निर्माण किया।
चन्द्रगुप्त पूरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफ़ल रहे। भारत राष्ट्र निर्माण मौर्य गणराज्य ( चन्द्रगुप्त मौर्य ) सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण की तिथि साधारणतया 322 ई.पू. निर्धारित की जाती है। उन्होंने लगभग 24 वर्ष तक शासन किया ।मेगस्थनीज ने चार साल तक चन्द्रगुप्त की सभा में एक यूनानी राजदूत के रूप में सेवाएँ दी। ग्रीक और लैटिन लेखों में , चंद्रगुप्त को क्रमशः सैंड्रोकोट्स और एंडोकॉटस के नाम से जाना जाता है।
चंद्रगुप्त का साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था। इसमें लगभग संपूर्ण उत्तरी और पूर्वी भारत के साथ साथ उत्तर में बलूचिस्तान, दक्षिण में मैसूर तथा दक्षिण-पश्चिम में सौराष्ट्र तक का विस्तृत भूप्रदेश सम्मिलित था। इनका साम्राज्य विस्तार उत्तर में हिंद्कुश तक दक्षिणमें कर्नाटकतक पूर्व में बंगाल तथा पश्चिम में सौराष्ट्र तक था साम्राज्य का सबसे बड़ा अधिकारी सम्राट् स्वयं था। शासन की सुविधा की दृष्टि से संपूर्ण साम्राज्य को विभिन्न प्रांतों में विभाजित कर दिया गया था। प्रांतों के शासक सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे। राज्यपालों की सहायता के लिये एक मंत्रिपरिषद् हुआ करती थी। केंद्रीय तथा प्रांतीय शासन के विभिन्न विभाग थे और सबके सब एक अध्यक्ष के निरीक्षण में कार्य करते थे। साम्राज्य के दूरस्थ प्रदेश सड़कों एवं राजमार्गों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे।
पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) चंद्रगुप्त की राजधानी थी जिसके विषय में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ ने विस्तृत विवरण दिए हैं।नगर के प्रशासनिक वृत्तांतों से हमें उस युग के सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को समझने में अच्छी सहायता मिलती है।
मौर्य शासन प्रबंध की प्रशंसा आधुनिक राजनीतिज्ञों ने भी की है जिसका आधार 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' एवं उसमें स्थापित की गई राज्य विषयक मान्यताएँ हैं। चंद्रगुप्त के समय में शासनव्यवस्था के सूत्र अत्यंत सुदृढ़ थे।
मौर्य शासकों की सूची
चन्द्रगुप्त मौर्य – 322-298 ईसा पूर्व (25 वर्ष)
बिन्दुसार – 298-273 ईसा पूर्व (25 वर्ष)
अशोक – 273-232 ईसा पूर्व (41 वर्ष)
कुणाल – 232-228 ईसा पूर्व (8 वर्ष)
दशरथ मौर्य –238-224 ईसा पूर्व (8 वर्ष)
सम्प्रति – 224-215 ईसा पूर्व (9 वर्ष)
शालिसुक –215-202 ईसा पूर्व (13 वर्ष)
देववर्मन् – 202-195 ईसा पूर्व (7 वर्ष)
शतधन्वन् मौर्य – 195-187 ईसा पूर्व (8 वर्ष)
बृहद्रथ मौर्य – 187-185 ईसा पूर्व (2 वर्ष)
चक्रवर्ती सम्राट अशोक
सम्राट अशोक, भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के इतिहास के सबसे महान शासकों में से एक हैं। साम्राज्य के विस्तार के अतिरिक्त प्रशासन तथा धार्मिक सहिष्णुता के क्षेत्र में भी उनका नाम अक़बर जैसे महान शासकों के साथ लिया जाता है। हालांकी वे अकबर से बहूत शक्तिशाली एवं महान सम्राट रहे है। कई विद्वान तो सम्राट अशोक को विश्व इतिहास के सबसे सफल शासक भी मानते हैं। अपने राजकुमार के दिनों में उन्होंने उज्जैन तथा तक्षशिला के विद्रोहों को दबा दिया था। पर कलिंग की लड़ाईउनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई और उनका मन युद्ध में हुए नरसंहार से ग्लानि से भर गया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया तथा उसके प्रचार के लिए बहूत कार्य किये। सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म मे उपगुप्त ने दीक्षित किया था। उन्होंने देवानांप्रिय, प्रियदर्शी, जैसी उपाधि धारण की। सम्राट अशोक के शिलालेख तथा शिलोत्कीर्ण उपदेश भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह पाए गए हैं। उसने धम्म का प्रचार करने के लिए विदेशों में भी अपने प्रचारक भेजे। जिन-जिन देशों में प्रचारक भेजे गए उनमें सीरिया तथा पश्चिम एशिया का एंटियोकस थियोस, मिस्र का टोलेमी फिलाडेलस, मकदूनिया का एंटीगोनस गोनातस, साईरीन का मेगास तथा एपाईरसका एलैक्जैंडर शामिल थे। अपने पुत्र महेंद्र को उन्होंने राजधानी पाटलिपुत्र से श्रीलंका जलमार्ग से रवाना किया। पटना (पाटलिपुत्र) का ऐतिहासिक महेन्द्रू घाट उसी के नाम पर नामकृत है। युद्ध से मन उब जाने के बाद भी सम्राट अशोक ने एक बड़ी सेना को बनाए रखा था। ऐसा विदेशी आक्रमण से साम्राज्य के पतन को रोकने के लिए आवश्यक था।
प्रियदर्शी विनोद मौर्या