कार्यक्रम के बारे में कुछ लिखने बैठा तो शब्द ही साथ छोड़ने लगे। मन में बस एक ही गीत गूंज रहा था…
‘ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तुझे… शबनम कहूँ, शोला कहूँ… फूलों में भी शोखी तो है… तुझको मगर किस सा कहूँ…’
शायद कल के कार्यक्रम की खूबसूरती को बयान करने के लिए इससे बेहतर शब्द हो ही नहीं सकते।
दोस्तों…
मैंने बहुत से कार्यक्रम देखे हैं… लेकिन कल का आयोजन… सच कहूँ… कुछ अलग ही था।
ऐसा लग रहा था जैसे…
‘जुगनू हैं या ज़मीन पर बिखरे हुए हैं तारे।’
हर कलाकार अपने आप में एक सितारा था।
मनोज भाई की कल्पना…
अजीत भाई का शानदार संचालन…
ओ.पी. सिंह जी का बेहतरीन डिजिटल प्रसारण…
शांत जी का गरिमामय व्यक्तित्व…
रूपा तिवारी जी की मधुर आवाज़…
नीना जी की शानदार प्रस्तुति…
सुनील भैया, मोहित भैया, अनुपमा जी, सुनीता जी, राकेश वर्मा जी, आमोद जी…
और उन सभी कलाकारों का क्या कहूँ जिनसे पहली बार मिलने का सौभाग्य मिला।
व्योमेश गोयल जी की प्रस्तुति ने तो सचमुच मन जीत लिया।
यदि अनजाने में किसी का नाम छूट जाए तो उसे मेरी भूल समझिएगा… क्योंकि मेरे लिए इस मंच का हर कलाकार सम्मान का पात्र है।
अरे हाँ… शबनम आहूजा जी, डॉ. पंकज जी और डॉ. ममता जी का उल्लेख किए बिना यह लेख अधूरा रह जाता। इन सभी की प्रस्तुति अत्यंत प्रभावशाली रही। जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।
रूपा जी…
आपका गीत…
‘दिल-ओ-जान लुटाने को जी चाहता है…’
अभी भी कानों में गूँज रहा है।
और मेरे जैसे एक साधारण शौकिया कलाकार के साथ आपने जो युगल गीत गाया…
वह मेरे लिए हमेशा एक यादगार पल रहेगा।
सचिन भाई की ऑर्केस्ट्रा टीम…
अंशु भैया की ढोलक…
पप्पी भाई का गिटार…
और पूरी टीम का तालमेल…
कमाल था… सचमुच कमाल।
और अंत में…
एम.के. सिंह जी को दिल से बधाई।
इस बार उन्होंने ऐसा कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसने पिछली सारी कमियों को पीछे छोड़ दिया।
मेरी ओर से सभी कलाकारों, आयोजकों, संगीतकारों और सहयोगियों को हृदय से प्रणाम।
ईश्वर करे…
संगीत का यह कारवाँ…
यूँ ही सुरों की नई ऊँचाइयों को छूता रहे।
प्रस्तुति : पीके श्रीवास्तव
