बिहार:(द दस्तक 24 न्यूज़) 23 अगस्त 2025 जिसे मखाने की धरती कहा जाता है, दुनिया के कुल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत मखाना अकेले उगाता है। यह राज्य की शान और वैश्विक स्तर पर पहचान का प्रतीक है। लेकिन इसी मखाने की खेती करने वाले किसान-मज़दूरों की ज़िंदगी बेहद दयनीय है।
किसानों की आपबीती: “मेहनत हमारी, फायदा दूसरों का”
तालाबों और खेतों में दिन-रात धूप और पानी में पसीना बहाने वाले किसान आज भी गरीबी और उपेक्षा झेल रहे हैं।
बड़े शहरों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में यही मखाना 1000 से 2000 रुपये प्रति किलो बिकता है, जबकि किसानों को उसकी तुलना में नाम मात्र का दाम मिलता है। किसानों का कहना है कि उनकी सालभर की मेहनत का 1% मुनाफ़ा भी उनके हिस्से नहीं आता।
कौन हैं ये किसान-मज़दूर?
मखाना उद्योग की असली रीढ़ वे लोग हैं, जो समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों से आते हैं।
अतिपिछड़े, दलित और बहुजन समाज के ये किसान
जिनके लिए यह खेती ही रोज़गार और जीवन का आधार है
लेकिन जिनकी मेहनत का असली मूल्य कुछ बिचौलियों और बड़े व्यापारियों की जेब में चला जाता है।
इन मेहनतकशों की पूरी पीढ़ी तालाबों और खेतों से जुड़ी रही है, मगर आर्थिक और सामाजिक न्याय से वे आज भी कोसों दूर हैं।
राहुल गांधी की मुलाक़ात
शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिहार के इन मखाना किसानों से उनके खेतों में जाकर भेंट की। उन्होंने किसानों की आपबीती सुनी और उनके संघर्षों को देश के सामने लाने का भरोसा दिलाया।
राहुल गांधी ने कहा कि –“यह कैसा अन्याय है कि 99% मेहनतकश बहुजन किसान पूरे उद्योग की नींव डालते हैं और मुनाफ़ा केवल 1% बिचौलियों को मिलता है। वोट चोर सरकार को न इनकी कदर है, न फिक्र। न आय दिया, न ही न्याय। कांग्रेस किसानों के हक़ की इस लड़ाई में उनके साथ खड़ी है।”
उन्होंने आगे कहा –“वोट का अधिकार और हुनर का हक़ एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनों को हम खोने नहीं देंगे।”
बिचौलियों का कब्ज़ा और सरकार की बेरुख़ी
किसानों का आरोप है कि मखाना व्यापार पर आज भी कुछ गिने-चुने व्यापारी और बिचौलिए काबिज़ हैं। यही वर्ग किसानों से औने-पौने दाम पर मखाना खरीदता है और फिर उसे कई गुना मुनाफ़े पर बाज़ार में बेचता है।
सरकार पर भी किसानों ने गहरी नाराज़गी जताई। उनका कहना है कि: मखाने पर कोई तय समर्थन मूल्य (MSP) नहीं है।
न ही किसानों को कर्ज़ माफी या सब्सिडी जैसी सुविधाएँ मिलती हैं। सरकार को सिर्फ़ वोट चाहिए, लेकिन उनके हक़ और भविष्य की चिंता नहीं है।
निष्कर्ष
बिहार का मखाना उद्योग विश्वस्तरीय है, लेकिन यह उद्योग तब तक अधूरा है, जब तक इसके असली मालिक – किसान-मज़दूर – अपने हक़ से वंचित रहेंगे।
आज यह सवाल सिर्फ़ मखाना किसानों का नहीं, बल्कि पूरे देश के मेहनतकश तबके का है कि क्या उनकी मेहनत का सही मूल्य उन्हें मिलेगा या नहीं।
राहुल गांधी की यह मुलाक़ात किसानों की आवाज़ को और बुलंद करती है और सरकार से यह सवाल पूछती है कि आखिर कब तक बहुजन मेहनतकशों की मेहनत पर मुट्ठीभर बिचौलियों का कब्ज़ा बना रहेगा।
