विजयादशमी की सुबह है। आज देश के हर घर में एक पुरानी रस्म होगी, शस्त्र-पूजा। किसान हल को तिलक लगाएगा, दुकानदार तराज़ू को, ड्राइवर अपनी गाड़ी को, और सैनिक अपनी राइफ़ल को। जिस चीज़ से रोज़ी चलती है, जिस चीज़ से रक्षा होती है, आज उसे धोकर, सजाकर, सामने रखकर उसे प्रणाम किया जाएगा।
इस रस्म की जड़ महाभारत में है। बारह साल के वनवास और एक साल के अज्ञातवास के बाद पांडव जब विराट नगर से निकले, तो सबसे पहले उस शमी वृक्ष के पास गए जिस पर उन्होंने अपने हथियार छिपाए थे। अर्जुन ने गांडीव उतारा, धूल झाड़ी, प्रत्यंचा चढ़ाई। यह दिन विजयादशमी था। उस दिन युद्ध नहीं हुआ था। उस दिन सिर्फ़ यह देखा गया था कि हथियार अभी वहीं है, सलामत है, काम करता है।
अब सोचिए कि एक साधारण नागरिक का शस्त्र क्या है।
न हल, न तराज़ू, न राइफ़ल। उसका एक ही शस्त्र है, और वह भी साल में एक बार नहीं, पाँच साल में एक बार काम आता है। बाक़ी समय वह किसी शमी वृक्ष पर टँगा रहता है, एक काग़ज़ के पन्ने पर, एक नाम की शक्ल में। मतदाता सूची का वह पन्ना ही उसका शमी वृक्ष है। और इस साल तेरह करोड़ लोगों ने उस वृक्ष के पास जाकर देखा तो हथियार वहाँ नहीं था।
किसी ने चुराया नहीं। किसी ने तोड़ा नहीं। बस एक सूची बनी, और उसमें वह नाम नहीं था। उसे "अनुपस्थित" लिखा गया, "स्थानांतरित" लिखा गया। अज्ञातवास में पांडवों की पहचान छिपी थी, पर हथियार सुरक्षित थे। आज उल्टा है। आदमी सामने खड़ा है, और उसका हथियार "नहीं मिला" की श्रेणी में है।
इसीलिए आज की शस्त्र-पूजा का एक नया अर्थ है।
आज अपने हल, तराज़ू, गाड़ी के साथ एक और चीज़ को प्रणाम कीजिए। अपने फ़ोन पर मतदाता सूची खोलिए और अपना नाम देखिए। अगर है, तो समझिए गांडीव सलामत है। अगर नहीं है, तो आज ही फ़ॉर्म-6 भरिए, क्योंकि प्रत्यंचा चढ़ाने का यही दिन है। और फिर घर में काम करने वाली से, गाँव से आए रिश्तेदार से, मुहल्ले के चौकीदार से पूछिए कि उनका शस्त्र उनके वृक्ष पर है या नहीं। क्योंकि पांडव पाँच थे, और शमी वृक्ष एक। हथियार सबके एक जगह थे। एक का छूट जाता तो पाँचों की लड़ाई कमज़ोर पड़ती।
पिछले दस दिनों में दिल्ली में कुछ लड़के इसी बात के लिए सड़क पर थे कि उस वृक्ष पर जाने दिया जाए, गिनती करने दी जाए। उनमें से दो आज भी तिहाड़ में हैं, और आज विजयादशमी की सुबह वे अपनी सातवीं रात के बाद उठेंगे। उनका अपराध इतना था कि उन्होंने शमी वृक्ष की ओर इशारा किया और कहा, देखो, हथियार कम हैं।
इस दिन बाहर के रावण से ज़्यादा ज़रूरी है भीतर के उस रावण को देखना जो कहता है, "मेरे अकेले के करने से क्या होगा।" यही वाक्य इस साल तेरह करोड़ बार बोला गया होगा, और इसीलिए तेरह करोड़ हथियार वृक्ष से उतर गए।
आज एक नाम देखिए। एक फ़ॉर्म भरिए। एक आदमी से पूछिए।
अर्जुन ने उस दिन युद्ध नहीं किया था। उसने बस यह सुनिश्चित किया था कि जब युद्ध का दिन आए, तो हथियार हाथ में हो। यही आज का काम है।
विजयादशमी की शुभकामनाएँ। शस्त्र सलामत रहें, सबके।