Monday, 19 October 2026 | 4:02 AM
संपादकीय

लंदन में लोकतंत्र की आवाज़, दिल्ली में बंद रास्ते: गांधी की प्रतिमा के सामने भारत का सवाल

लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में गांधी की प्रतिमा के सामने भारतीय प्रदर्शनकारियों के दो समूहों का दृश्य लोकतंत्र, राजनीतिक असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा करता है। एक ओर ‘वोट चोरी बंद करो’ के नारे हैं, दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में आवाज़ें। इस दृश्य को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की अंतरराष्ट्रीय परंपरा, गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों तथा दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंधों के संदर्भ में देखा गया है। संपादकीय का मूल प्रश्न है कि क्या भारतीय नागरिक अपने देश में उतनी स्वतंत्रता से असहमति व्यक्त कर सकते हैं, जितनी उन्हें विदेश में मिलती है? यह लेख सभी पक्षों के विरोध करने के अधिकार को स्वीकार करते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक विरोध स्थलों की भूमिका पर विचार करता है।
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लंदन में लोकतंत्र की आवाज़, दिल्ली में बंद रास्ते: गांधी की प्रतिमा के सामने भारत का सवाल
गांधी की प्रतिमा के सामने विरोध के दो स्वर, बीच में पुलिस और लोकतंत्र का एक बड़ा सवाल—क्या भारत में असहमति के लिए पर्याप्त जगह बची है?
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लंदन, पार्लियामेंट स्क्वायर, शनिवार दोपहर। ब्रिटिश संसद के सामने गांधी की प्रतिमा। उसके एक ओर सैकड़ों भारतीय छात्र "वोट चोरी बंद करो" के तख़्ती लिए, दूसरी ओर एक छोटा समूह "मोदी, मोदी" के नारे लगाता हुआ। बीच में लंदन की पुलिस, दोनों को अलग रखे हुए। और सबके ऊपर, काँसे में ढला वह दुबला आदमी, जो 1931 में इसी संसद से लड़ने आया था और आज इसी के सामने खड़ा है।
इस दृश्य को ज़रा ठहरकर देखिए। क्योंकि इसमें आज का भारत पूरा का पूरा समाया हुआ है।
पहली बात। जिस आदमी की प्रतिमा के नीचे यह सब हुआ, उसे भी अपने समय में "विदेशी ताक़तों का एजेंट" कहा गया था। उसने दक्षिण अफ़्रीका में भारत के लिए लड़ाई शुरू की थी, यानी विदेश में। उसके साथ लंदन में इंडिया लीग के कृष्ण मेनन थे, अमेरिका में ग़दर पार्टी वाले थे, जर्मनी में सुभाष थे। भारत की आज़ादी की आधी लड़ाई भारत के बाहर लड़ी गई थी। इसलिए जब कल लंदन में एक भारतीय युवा ने कहा कि "हम किसी विदेशी हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं, हम यहाँ भारतीयों से बात करने आए हैं," तो वह एक बहुत पुरानी परंपरा में खड़ा था। उस परंपरा में, जिसे आज उसी के देश में "विदेशी साज़िश" कहा जा रहा है।
दूसरी बात, जो पहली से ज़्यादा तीखी है। वहाँ इकट्ठा हुए अधिकांश लोग भारत में वोट नहीं दे सकते। वे छात्र हैं, कामगार हैं, उनका नाम किसी सूची में शायद है ही नहीं। वे उन तेरह करोड़ नामों के लिए खड़े थे जो उनके अपने नहीं हैं। किसी और के वोट के लिए सात हज़ार किलोमीटर दूर खड़ा होना, यह स्वार्थ नहीं हो सकता। इसे चाहे जो नाम दीजिए, साज़िश मत कहिए।
तीसरी बात। गांधी की प्रतिमा के इस पार "वोट चोरी" और उस पार "मोदी, मोदी"। यह दो देशों की लड़ाई नहीं थी। यह एक ही देश था, दो हिस्सों में, एक विदेशी चौराहे पर, अपने ही राष्ट्रपिता के सामने। और उन्हें अलग रखने के लिए विदेशी पुलिस चाहिए थी। इस दृश्य पर गर्व करना मुश्किल है, चाहे आप किसी भी ओर खड़े हों।
पर सबसे बड़ी बात अभी बाक़ी है।
लंदन में यह सब हो सका। बिना बंधपत्र के। बिना किसी को विमान से उतारे। बिना मेट्रो बंद किए। पक्ष और विपक्ष, दोनों ने अपनी बात कही, पुलिस ने दोनों को जगह दी, कोई हिरासत में नहीं गया। दिल्ली में उसी सप्ताह जंतर-मंतर नक्शे से हटा, एक पार्क "प्रशासनिक कारणों" से बंद हुआ, और झंडा लहराने की घोषणा पर एक आदमी को घर में बंद किया गया।
तो भारत के लोकतंत्र पर भारतीय ज़्यादा सुरक्षित बहस कहाँ कर पा रहे हैं? अपने देश में, या उस देश में जिससे उन्होंने अपना देश छीना था?
यह प्रश्न किसी को बुरा लग सकता है। लगना भी चाहिए। क्योंकि इसका उत्तर अगर "लंदन" है, तो कोई नारा, कोई प्रति-प्रदर्शन, कोई "मोदी मोदी" उस शर्म को नहीं ढक सकता।
और एक आख़िरी बात उस छोटे समूह के लिए जो उस पार खड़ा था। उन्हें भी वहाँ खड़े होने का पूरा अधिकार था, और अच्छा हुआ कि वे खड़े हुए। बस एक सवाल अपने आप से पूछिए। अगर कल आपकी सरकार बदले और आपके नाम सूची से कटें, तो आप कहाँ खड़े होना चाहेंगे, लंदन में, या अपने देश के जंतर-मंतर पर? और अगर उत्तर "जंतर-मंतर" है, तो आज उसे बचाने की लड़ाई आपकी भी है।
डॉ. अम्बेडकर 1930 में इसी लंदन में गोलमेज़ सम्मेलन में बैठे थे, और वहाँ उन्होंने कहा था कि भारत की स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह उसके सबसे दबे हुए आदमी तक पहुँचे। कल उसी शहर में उसी दबे हुए आदमी के वोट के लिए नारे लगे। गांधी ने कहा था कि स्वराज का अर्थ है हर आदमी का यह भरोसा कि उसकी गिनती है। वह प्रतिमा कल यह सुन रही थी, और शायद सोच रही थी कि यह बहस उसके अपने देश में क्यों नहीं हो पा रही।
आज रविवार है। पार्लियामेंट स्क्वायर ख़ाली होगा। गांधी वहीं खड़े होंगे। और यहाँ दिल्ली में कल दो लड़के तिहाड़ से निकलेंगे।