Friday, 16 October 2026 | 3:51 AM
संपादकीय

जाति की सड़ांध कब मिटेगी? जन्म के आधार पर ऊँच-नीच मानवता के माथे पर कलंक

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जाति की सड़ांध कब मिटेगी? जन्म के आधार पर ऊँच-नीच मानवता के माथे पर कलंक
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एक समाज जो मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊँचा-नीचा ठहराता है, वह सभ्यता नहीं — सड़ांध है। और यह सड़ांध आज भी मानवता के माथे पर कलंक बनकर बैठी है।
जाति-व्यवस्था केवल अतीत का पाप नहीं है। यह आज भी हत्या करती है — कभी प्रेम करने वाले युवक-युवती की, कभी मूँछ रखने या घोड़ी चढ़ने वाले दूल्हे की, कभी कुएँ से पानी भरने वाले बालक की। जो इन हत्याओं को "परंपरा", "सम्मान" या "व्यवस्था" कहकर ढाँपते हैं, वे हत्यारे के साथ खड़े हैं। और जो तथाकथित बुद्धिजीवी इन्हें तर्कों की चादर ओढ़ाकर सही ठहराते हैं, उनका अपराध हत्यारे से भी गहरा है — क्योंकि वे अगली हत्या के लिए बौद्धिक अनुमति तैयार करते हैं।
बाबासाहेब ने 1936 में ही लिख दिया था कि जाति कोई ईंट-पत्थर की दीवार नहीं, एक मानसिकता है; और मानसिकता को ढहाना ही असली क्रांति है। हमारे संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त घोषित करता है — पर कानून की धारा समाज के मन में तब तक नहीं उतरती, जब तक हम स्वयं उसे न उतारें। गायत्री परिवार के युग निर्माण सत्संकल्प में भी यही शपथ है — मनुष्य-मनुष्य के बीच जन्म के आधार पर कोई ऊँच-नीच नहीं मानेंगे। गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का "व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण" इसी भेद को मिटाने से प्रारंभ होता है।
इतिहास किसी को नहीं छोड़ता। हर हत्यारे, हर समर्थक और हर मौन साक्षी का हिसाब वह अवश्य लेता है — कभी न्यायालय में, कभी आने वाली पीढ़ियों की दृष्टि में। प्रश्न केवल इतना है कि उस दिन हम किस पंक्ति में खड़े मिलेंगे।
आप बताइए — जाति की यह सड़ांध मिटाने की पहली जिम्मेदारी किसकी है: कानून की, समाज की, या हमारे अपने घर की?