Monday, 14 September 2026 | 10:46 PM
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जे पी नड्डा ; एक साधारण नेता के सीढ़ी दर सीढ़ी सबसे शक्तिशाली पार्टी के शीर्ष पर पहुंचने की कहानी

जे पी नड्डा का पूरा नाम जगत प्रकाश नड्डा। लो-प्रोफाइल रहकर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के हाई-प्रोफाइल नेता बनने का उनका सफर काफी लंबा रहा है। जेपी आंदोलन से प्रभावित होकर राजनीति में कदम रखने वाले नड्डा ने अपनी छवि एक प्रभावी और कुशल रणनीतिकार की बनाई। भाजपा का नेतृत्व बदलता रहा लेकिन पार्टी में उनकी
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जे पी नड्डा का पूरा नाम जगत प्रकाश नड्डा। लो-प्रोफाइल रहकर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के हाई-प्रोफाइल नेता बनने का उनका सफर काफी लंबा रहा है। जेपी आंदोलन से प्रभावित होकर राजनीति में कदम रखने वाले नड्डा ने अपनी छवि एक प्रभावी और कुशल रणनीतिकार की बनाई। भाजपा का नेतृत्व बदलता रहा लेकिन पार्टी में उनकी हैसियत कभी नहीं बदली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संगठन में उनकी पैठ बढ़ती रही। वह पुराने नेतृत्व के भी करीब रहे तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भी भरोसेमंद माने गए। अब पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद यह कहना मुनासिब ही होगा कि वे भाजपा की ताकतवर तिकड़ी का हिस्सा बन गए हैं। बिहार में जन्मे नड्डा को किशोयरवय में ही पता लग गया था कि वह राजनीति के लिए बने हैं और राजनीति उनके लिए। जब 16 बरस के थे तो जेपी आंदोलन से जुड़ गए। लिहाजा, राजनीति का ककहरा मंझे राजनेताओं के दौर में सीखने को मिला। इसके बाद सीधे छात्र राजनीति से जुड़ गए। उनकी काबिलियत देखते हुए ही 1982 में उन्हें उनकी पैतृक जमीन हिमाचल में विद्यार्थी परिषद का प्रचारक बनाकर भेजा गया। वहां छात्रों के बीच नड्डा ने ऐसी लोकप्रियता हासिल कर ली थी कि उनके नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश विवि के इतिहास में पहली बार एबीवीपी ने जीत हासिल की। 1983-84 में वे विवि में एबीवीपी के पहले अध्यक्ष बने। 1977 से 1990 तक करीब 13 साल के लिए एबीवीपी समेत कई पदों पर रहे। 1989 में तत्कालीन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार की लड़ाई के लिए राष्ट्रीय संघर्ष मोर्चा बनाया। 1991 में 31 साल की उम्र में भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर उभरे। छात्र राजनीति में तप चुके नड्डा 1993 में पहली बार हिमाचल प्रदेश में विधायक बने। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हिमाचल के स्वास्थ्य मंत्री रहे तो वन एवं पर्यावरण, विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री का जिम्मा भी संभाला।

2012 में राज्यसभा पहुंचे और कई संसदीय समितियों में रहे। तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की टीम में राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता रहे। अपने सौम्य स्वभाव, सादगी और मेहनतकश छवि से उन्होंने भाजपा में अलग नाम बनाया है। संगठन से लेकर चुनाव मैनेजमेंट में उन्होंने महारत हासिल कर ली है। आगे अगर वह अमित शाह की जगह लेने जा रहे हैं तो इसके पीछे उनके द्वारा शाह जैसा कारनामा कर दिखाना भी बड़ी वजह है। बीते पांच बरसों में भाजपा में नड्डा ने कई जिम्मेदारियां सफलतापूर्वक निभाई हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी मुख्यालय से देशभर में पार्टी के अभियान की निगरानी की थी तो 2019 में उनके पास उत्तर प्रदेश का प्रभार था। जाहिर है जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, जिसमें वे सफल भी रहे। सपा-बसपा गठबंधन के बाद जहां भाजपा को यूपी में आधी सीटें मिलने के आसार जताए जा रहे थे, वहां पार्टी ने 62 सीटें जीतीं। इस चुनाव में वह फिर से कुशल रणनीतिकार साबित हुए और पार्टी को 49.6 फीसदी वोट दिलाने का करिश्मा कर दिखाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ नड्डा के नजदीकी  रिश्ते रहे हैं। मोदी जब हिमाचल के प्रभारी हुआ करते थे तब से दोनों के बीच अच्छे समीकरण बने रहे हैं। दोनों अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय में बने आउट हाउस में रहते थे। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्वास्थ्य मंत्रालय भी संभाला। इस बार जब उन्होंने शपथ नहीं ली तो लगभग तय माना जा रहा था कि पार्टी अध्यक्ष का पद जगत प्रकाश नड्डा के लिए ही रखा गया है, जिस पर सोमवार को मुहर भी लग गई। एक नई पारी के साथ 59 वर्षीय नड्डा सबसे शक्तिशाली दल के शीर्ष पर पहुंच गए हैं। उनके लिए पहली सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल में भाजपा के सरकार बनाने के मिशन को पूरा करना रहेगी।