Monday, 12 October 2026 | 4:00 AM
संपादकीय

त्योहार खुशी के, लूट के नहीं |

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त्योहार खुशी के, लूट के नहीं |
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त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. अब चारों ओर गहमागहमी नजर आने लगी है. बाजार सज रहे हैं. काम की तलाश में दूसरे शहरों में गए लोग घर लौटने के इंतजाम में लग गए हैं. गांव हो या शहर हर जगह त्योहारों की रौनक दिखाई देने लगी है. अक्तूबर से शुरू होने वाला त्योहारों का सीजन नए साल का जश्न मना कर ही खत्म होता है. इस बीच दशहरा, भैया दूज, दीवाली, छठ और क्रिसमस जैसे बड़े त्योहार आते हैं जो भारत के हर गांव, हर शहर और हर तबके को खुशियों से भर देते हैं. यही भारत की असली पहचान है लेकिन इन त्योहारों को धर्म ने हाइजैक किया हुआ है.
त्योहार जरूरी होते है. त्योहारों से सामाजिक मेलमिलाप बढ़ता है. किसी को बोनस मिलता है तो किसी को सालभर की भागदौड़ से छुट्टी मिलती है. इस दौरान छोटे व्यापारियों की रोजीरोटी चलती है जिस से बाजार जिंदा हो जाते हैं

धर्मों का कब्जा
त्योहारों का एक नकारात्मक पहलू भी है. इस में धर्म के नाम पर फुजूलखर्ची को बढ़ावा मिलता है. मंदिर, मूर्ति, पूजापाठ और दक्षिणा के खेल में सब से ज्यादा आम आदमी लूटा जाता है. अमीर शौक से खर्च करता है लेकिन गरीब का बजट बिगड़ जाता है. सब से जरूरी बात यह है कि त्योहारों को सिर्फ खुशी, खरीदारी और सामाजिक मेलमिलाप के तौर पर ही मनाया जाए. इस में धर्म को घुसेड़ना बिलकुल भी ठीक नहीं है क्योंकि धर्मों ने ज्यादातर त्योहारों को हड़प लिया है. उन्हें मंदिरों, पंडों, चर्चा, पादरियों, मसजिदों, मौलवियों के हाथों में लूटने का हथियार बना दिया है.
धर्म ने त्योहारों को हाइजैक कैसे किया
त्योहार पहले खेती से जुड़े महत्त्वपूर्ण इवेंट्स को सैलिब्रेट करने का जरिया हुआ करते थे. इतिहासकार डी डी कोसंबी ने लिखा है कि 7वीं से 12वीं सदी के बीच जब जमीन पर राजा और पुरोहित के कब्जे बढ़े तो फसल वाले हर त्योहार पर एक राजा की जीत या किसी भगवान के चमत्कार की कहानी चिपका दी गई. 7वीं से 12वीं सदी में जब जमीन राजा और बड़े मंदिरों के हाथ में गई तो खेत के त्योहार को कंट्रोल करना जरूरी हो गया. अगर त्योहार खेत का रहता तो किसान मालिक हो जाता और अगर त्योहार राजा या भगवान की कहानी कहता तो जमीन का मालिक राजा और पुरोहित बन जाता. यही कारण है कि हर त्योहार के पीछे कोई धार्मिक कहानी जुड़ी होती है.
 वाल्मीकि रामायण में दीवाली का जिक्र तक नहीं है, भगवान राम की वापसी चैत्र में बताई गई है, कार्तिक में नहीं. लेकिन 16वीं सदी के बाद के पंचांगों में इसे कार्तिक में जोड़ दिया गया. यही हाल बाकी त्योहारों का भी है. ज्यादातर त्योहार धर्म से पुराने लेकिन धर्मों ने इन्हें हाइजैक कर इन में अपनी कहानी घुसेड़ दी ताकि पंडों को मुफ्त में दानदक्षिणा मिल सके. मानव विज्ञानी मानते हैं कि इंसान ने कैलेंडर धर्म की वजह से नहीं बल्कि खेत, फसल और भूख के कारण बनाया. यही कारण है कि भारत के 80 प्रतिशत बड़े त्योहारों का सीधा संबंध एग्रीकल्चर साइकल से है.
दीवाली कार्तिक में आती है, यही धान और बाजरा की नई फसल घर में आने का समय है. किसान के घर में अनाज आया तो उस ने दीया जलाया, यह समृद्धि का जश्न था. होली फाल्गुन में आती है, जब सरसों और टेसू के फूल खिलते हैं. लाल, पीला रंग खेत से ही आया, मंदिर से नहीं. पोंगल, लोहड़ी, बीहू, ओणम सब खेत से जुड़े त्योहार ही हैं. चावल पका, गन्ना पका तो मेहनतकश, मजदूर और किसानों ने मिल कर जश्न मनाया. ईद उल फितर भी इसी साइकल से जुड़ी थी, रमजान के बाद जब व्यापारी फसल बेच कर लौटता था तो वह पूरे कुनबे के साथ एकसाथ बैठ कर मीठा खाता था. इसे ईद कहा गया. इन में न मंदिर था, न मसजिद थी, न पंडित था और न मौलवी. बस, गांव का खलिहान ही केंद्र में था. सब खाते थे, सब नाचते थे. कोई शुद्धअशुद्ध नहीं, कोई ऊंचनीच नहीं.
पुरोहितों ने किसानों की मेहनत को हड़पने के लिए इन पर धर्म की मुहर लगा दी. बसंत के रंग वाले त्योहार पर प्रह्लाद की कहानी चिपका दी गई. पोंगल, जो सूरज और बैल का शुक्रिया था, पर देवताओं की कहानी जोड़ दी गई. ईद जो फसल बेच कर मिलने का त्योहार थी, उस पर जंग ए बद्र की जीत की कहानी जोड़ दी गई ताकि वह व्यापारियों का नहीं, सिपाहियों का त्योहार लगे. यह पैटर्न दुनियाभर में है. यूरोप में भी विंटर सौल्सटिस, जो फसल का आखिरी दिन था, को क्रिसमस बना दिया गया.
धर्म की कहानी घुसते ही त्योहारों में दान घुस गया. जब त्योहार खेत का था तो खर्च बराबर बंटता था. जब वह धर्म का बना तो खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा मंदिर, मसजिद, चर्च और उन के ट्रस्ट में जाने लगा, धर्म की कहानी घुसते ही डर भी घुसा, अगर पूजा नहीं करोगे तो पाप लगेगा, अगर व्रत नहीं रखोगी तो पति की उम्र कम होगी, अगर जकात नहीं दोगे तो बरकत नहीं होगी. डर से आदमी सवाल नहीं पूछता. बस, जेब खोल देता है. यही मौलवियों और पंडों की मुफ्त की दक्षिणा का मॉडल है.