Sunday, 18 October 2026 | 4:27 AM
संपादकीय

बैरिकेड के इस पार भी लड़का, उस पार भी लड़का: लोकतंत्र के बीच खड़ी व्यवस्था

कनॉट प्लेस के बैरिकेड के दोनों ओर खड़े प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी की तस्वीर के माध्यम से यह संपादकीय भारतीय लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है। मतदाता सूची से नाम हटने, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की जगह सीमित होने, अदालतों में सरकारी जवाबदेही और विरोध करने के अधिकार जैसे मुद्दों के बीच लेख बताता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के भरोसे और अधिकारों से मजबूत होता है। इसका केंद्रीय सवाल है—जब प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी दोनों इसी समाज का हिस्सा हैं, तो उनके बीच टकराव की स्थिति पैदा करने वाली व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?
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बैरिकेड के इस पार भी लड़का, उस पार भी लड़का: लोकतंत्र के बीच खड़ी व्यवस्था
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कनॉट प्लेस के बैरिकेड के इस पार एक लड़का था, उस पार भी एक लड़का था। इस पार वाले के हाथ में तिरंगा, उस पार वाले के हाथ में लाठी। दोनों गाँव से आए थे, दोनों ने एक जैसी किराए की छत के नीचे एक जैसा सपना देखा था। एक का टूटा तो वह सड़क पर आया, दूसरे का थोड़ा पूरा हुआ तो वह वर्दी में उसी सड़क पर खड़ा कर दिया गया। बीच में लोहे का बैरिकेड, जो दोनों में से किसी ने नहीं लगाया।
तो लगाया किसने?
यही वह प्रश्न है जिससे इस हफ़्ते की हर तस्वीर बचती रही। क्योंकि इसका उत्तर न प्रदर्शनकारी है, न पुलिसवाला। उत्तर वह व्यवस्था है जिसे इन दोनों के लिए कुछ करना था और जो दोनों में चूक गई।
उसे इस देश के हर नागरिक का नाम एक सूची में सुरक्षित रखना था। तेरह करोड़ नाम हटे, और हटाने वाली संस्था ने पूरे हफ़्ते एक शब्द नहीं कहा, जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने पंद्रह दिन की मोहलत वाला नोटिस नहीं थमाया। जिस आयोग को सवाल का जवाब देना था, उसे अदालत से बुलवाना पड़ा।
उसे नागरिक को शिकायत की एक जगह देनी थी। तेंतीस साल पुराना जंतर-मंतर एक नोटिस से नक्शे से हट गया, और उस समिति का नाम, जिसकी सिफ़ारिश पर यह हुआ, हाईकोर्ट में कुछ और बताया गया, सुप्रीम कोर्ट में कुछ और। एक ही व्यवस्था ने दो अदालतों को दो कहानियाँ सुनाईं।
उसे अदालत के आदेश का सम्मान करना था। गृह सचिव ने माफ़ी लिखी, और उसी पन्ने पर अगली बार फिर इंटरनेट बंद करने की इजाज़त माँगी। उसके वकील ने कहा, माफ़ी तो प्रक्रिया का हिस्सा है। मुख्य न्यायाधीश को कहना पड़ा कि आपकी इसी दलील से वह माफ़ी सशर्त हो गई।
उसे एक दादी के पोते को उसकी चिता तक पहुँचाना था। वह पोता हवाई जहाज़ से उतारा गया और उस सुबह थाने के सामने खड़ा था जब हिंगोली के गाँव में राख ठंडी हो रही थी।
उसे तिरंगे को हर हाथ में देखकर गर्व करना था। उसने तिरंगा लहराने वालों को उठाया और फिर अपने चुने हुए लोगों से वही झंडा लहरवाया। आयोजक जेल में, झंडा पुलिस के हाथ में।
और उसे उस कांस्टेबल का भी ख़याल रखना था जिसे सुबह चार बजे बस में बिठाकर कहा गया कि अपने जैसे लड़कों को उठाओ। तीन साल पहले वह ख़ुद पेपर लीक के विरुद्ध मुखर्जी नगर में खड़ा था, तब उसके सामने भी एक वर्दी थी। अब वर्दी उसके बदन पर है और सामने उसका ही पुराना चेहरा। शाम को जब वह लड़का हिरासत की बस में बैठाया गया, कांस्टेबल ने ज़मीन से झंडा उठाया और तह करके जेब में रख लिया। कैमरे गिरफ़्तारी देखते हैं, तह किया हुआ झंडा नहीं।
अब ज़रा उस आदमी की तरफ़ देखिए जो न इस पार है, न उस पार। जो सुबह दफ़्तर गया, शाम को सब्ज़ी लाया, रात को फ़ोन पर दो मिनट का वीडियो देखा और सो गया। उसे लगता है कि यह सब दिल्ली की बात है। उसे यह समझना ज़रूरी है कि इस हफ़्ते उसका क्या टूटा।
टूटा यह भरोसा कि उसका नाम सूची में है, क्योंकि चौदह में से एक नाम नहीं है और उसे पता भी नहीं कि वह कौन-सा है। टूटा यह भरोसा कि अगर कभी ज़रूरत पड़ी तो वह कहीं खड़ा होकर कह सकेगा, क्योंकि कहने की जगह अब "समिति की सिफ़ारिश" पर तय होती है। टूटा यह भरोसा कि सरकार अदालत में जो लिखती है, उसका मतलब वही होता है जो लिखा है। टूटा यह भरोसा कि झंडा उसका है, क्योंकि अब उसे लहराने की संख्या, जगह और अनुमति कोई और तय करता है। और टूटा यह भरोसा कि अदालत का दरवाज़ा उसके लिए खुला है, क्योंकि जो पैदल याचिका लेकर गए, उन्हें छह सौ मीटर पहले रोका गया और भीतर पहुँचकर उनसे उनका आचरण पूछा गया।
भरोसा काँच की तरह नहीं टूटता कि आवाज़ हो। वह रेत की तरह रिसता है। जब तक पता चले, मुट्ठी ख़ाली हो चुकी होती है। और इस हफ़्ते इस देश की मुट्ठी से बहुत रेत गई है।
यह याद रखिए कि यही व्यवस्था 2011 में कह रही थी कि हाथ बंधे न होते तो केंद्र से लड़ाई छेड़ देते, और 2013 में कह रही थी कि जनता सत्ता उखाड़ने के लिए आक्रामक हो रही है। तब वह सब लोकतंत्र था। आज वही माँग अराजकता है। माँग नहीं बदली, कुर्सी बदली, और कुर्सी के साथ शब्दकोश।
व्यवस्था बदलने का रास्ता सत्ता की सीढ़ी से नहीं, मनुष्य के हृदय से होकर जाता है। इस हफ़्ते का सबसे बड़ा ख़तरा बैरिकेड नहीं है। ख़तरा यह है कि बैरिकेड के दोनों ओर खड़े लड़के एक-दूसरे को दुश्मन मानने लगें, और बीच का आदमी यह मान ले कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। जिस दिन ये दोनों बातें हो गईं, उस दिन बैरिकेड लगाने वाले का काम हमेशा के लिए आसान हो जाएगा।
भारत में लोकतंत्र ऊपरी परत है, नीचे की मिट्टी अब भी अलोकतांत्रिक है। परत इस हफ़्ते कई जगह से छिली। पर नीचे से कुछ और भी दिखा। थाने के बाहर रातभर खड़े माता-पिता। सफ़ेद रिबन बाँधे चुप खड़े वकील। जेब में तह किया हुआ झंडा रखने वाला कांस्टेबल। और वे लोग जो पहली बार अपना वोटर कार्ड ढूँढ़ने निकले।
लोकतंत्र शायद ऐसे ही बचता है, किसी बड़े दिन से नहीं, उन छोटे दिनों से जब कोई मुट्ठी भर रेत बचा लेता है।
तो आज दो काम। अपना नाम मतदाता सूची में देख लीजिए, आज ही। और एक बार सोच लीजिए कि बैरिकेड के दोनों पार खड़े लड़के अगर आपके घर के होते, तो आप किसकी तरफ़ खड़े होते। अगर उत्तर "दोनों की" है, तो बैरिकेड लगाने वाले की तरफ़ कौन बचा?