फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 03 जनवरी 2026 भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारिका एवं नारी शिक्षा की प्रणेता माता सावित्रीबाई फुले का 195वां जन्मदिन आज सिद्धार्थ कॉन्वेंट स्कूल, अजमतपुर, फर्रुखाबाद में अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और सामाजिक चेतना के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, माताएं-बहनें, समाजसेवी, शिक्षक एवं विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में समाज के सभी वर्गों ने बढ़-चढ़कर सहभागिता की और माता सावित्रीबाई फुले के संघर्षमय जीवन एवं योगदान को स्मरण किया गया।
मुख्य वक्ता ने रखा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता इंजी. नीरज प्रताप शाक्य, जिला अध्यक्ष आम आदमी पार्टी, फर्रुखाबाद ने अपने संबोधन में कहा कि-“आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व देश में बेटियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। ऐसे अंधकारमय समय में माता सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा की मशाल जलाकर समाज को नई दिशा दी।”
उन्होंने सावित्रीबाई फुले के संघर्ष, साहस और सामाजिक योगदान को आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की जननी
माता सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था। उनके पिता खंडोजी नेवसे एवं माता लक्ष्मीबाई थीं। मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले से हुआ।
शादी के बाद स्वयं शिक्षित होकर उन्होंने भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनने का गौरव प्राप्त किया।
समाज की रूढ़ियों से टकराया साहस
जब समाज में लड़कियों की शिक्षा को पाप माना जाता था, तब सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा फुले, उस्मान शेख एवं फातिमा शेख के सहयोग से 1848 में भारत का पहला कन्या विद्यालय स्थापित किया।
विद्यालय जाते समय उन्हें गालियां, पत्थर, कीचड़, गोबर और यहां तक कि मानव-मल तक फेंका गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने साथ अतिरिक्त साड़ी रखती थीं और अपमान सहते हुए भी शिक्षा का दीप जलाए रखती थीं।
विधवा पुनर्विवाह और बाल संरक्षण की पहल
स्त्री शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने विधवाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने हेतु विधवा पुनर्विवाह आंदोलन चलाया।
1854 में विधवाओं के लिए आश्रम एवं नवजात शिशुओं की रक्षा हेतु बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। उन्होंने काशीबाई नामक विधवा की रक्षा कर उसके पुत्र यशवंत को दत्तक लिया, जो आगे चलकर प्रसिद्ध डॉक्टर बने।
कवयित्री और विचारक
सावित्रीबाई फुले एक सशक्त कवयित्री भी थीं। उनकी प्रमुख कृतियाँ—काव्य फुले बावनकशी सुबोधरत्नाकर आज भी सामाजिक चेतना की प्रेरणा हैं। वे कहा करती थीं—“अब बिल्कुल भी खाली मत बैठो, जाओ शिक्षा प्राप्त करो।”
सत्यशोधक समाज और सामाजिक क्रांति
24 सितंबर 1873 को महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज में सावित्रीबाई फुले महिला विभाग की प्रमुख रहीं। इस संस्था का उद्देश्य शूद्रों, अतिशूद्रों एवं महिलाओं को सामाजिक शोषण से मुक्ति दिलाना था।
मानवता की मिसाल बनी अंतिम यात्रा
1897 में पुणे में फैले भयंकर प्लेग के दौरान रोगियों की सेवा करते हुए, एक पीड़ित बच्चे को पीठ पर लाने के कारण वे स्वयं संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका देहावसान हो गया। उनका जीवन त्याग, करुणा और मानव सेवा का अनुपम उदाहरण है।
कार्यक्रम में ये रहे प्रमुख अतिथि
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में समाजसेवी अशोक मौर्य, शिक्षक मुकेश शाक्य, सुभाष, भोजराज सिंह, डॉ. महावीर सिंह, डॉ. विजय कुमार शाक्य, किसान नेता जगदीश सिंह शाक्य, जहांगीर मंसूरी, रवीश कुमार गौतम, प्रताप सिंह यादव, सोनू कुशवाह, जगतपाल शाक्य, अंकित शाक्य, वैभव प्रताप, कवि विशाल, राष्ट्रीय खिलाड़ी रौनक शाक्य सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
आयोजन एवं संचालन
कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय स्वास्थ्य महासभा, फर्रुखाबाद द्वारा किया गया।
जिला अध्यक्ष शिवम कुमार शाक्य, मनोज कुमार, नवीन कुमार, प्रताप सिंह, शिवांशु एवं पूरी टीम ने मंच सज्जा, संचालन एवं जलपान व्यवस्था संभाली। कार्यक्रम का कुशल संचालन एलआईसी अधिकारी महेंद्र सिंह शाक्य ने किया।
