नई दिल्ली:जेम्स प्रिंसेप की जयंती पर विशेष: भारत को उसका सम्राट अशोक दिलाने वाले महान विद्वान

नई दिल्ली:(द दस्तक 24 न्यूज़) 20 अगस्त 2025 भारत के गौरवशाली इतिहास को दुनिया के सामने उजागर करने वाले महान विद्वान जेम्स प्रिंसेप की जयंती आज पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। 20 अगस्त 1799 को जन्मे प्रिंसेप ने अपने अल्प जीवन में वह कर दिखाया, जो सदियों तक इतिहास की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ।

★धम्मलिपि को पढ़ने का संघर्ष

19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतभर में फैले प्राचीन शिलालेख और अभिलेख विद्वानों के लिए रहस्य बने हुए थे। ब्राह्मी और खरोष्ठी जैसी लिपियाँ समय के साथ लुप्त हो चुकी थीं। कई विद्वानों ने इन्हें पढ़ने की कोशिश की, लेकिन सही अर्थ तक नहीं पहुँच सके।

स्टीवेन्सन ने “देवानंपिय पियदस्सी” को गलत ढंग से “द्वधारं पिये पिय” पढ़ा। हालांकि यह एक प्रयास था, लेकिन सही रहस्य अभी भी अनसुलझा था।

★प्रिंसेप की प्रतिभा और खोज

जेम्स प्रिंसेप ने अथक प्रयासों के बाद ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता हासिल की। उन्होंने “देवानंपिय पियदस्सी” को सही ढंग से पढ़ लिया। हालांकि शुरुआत में वे इसे बुद्ध अथवा श्रीलंका (सिलोन) के राजा तिस्स से जोड़ बैठे, लेकिन जल्द ही सही पहचान सामने आई।

★टर्नर और दीपवंश का सूत्र

उसी समय श्रीलंका में विद्वान टर्नर पालि साहित्य का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने “दीपवंश” नामक ग्रंथ पढ़ते हुए पाया कि बुद्ध के निर्वाण के 218 वर्ष बाद ‘पियदस्सी’ नामक सम्राट का अभिषेक हुआ था। यह सम्राट कोई और नहीं बल्कि सम्राट अशोक महान थे, जो चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र थे।

टर्नर ने यह खोज प्रिंसेप को बताई और प्रिंसेप ने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया। इसी के साथ 1837 में भारत को उसका वास्तविक सम्राट मिल गया और इतिहास की एक भयंकर भूल सुधर गई।

★अल्प जीवन, अमर योगदान

जेम्स प्रिंसेप ने मात्र कुछ वर्षों की मेहनत से हजारों साल पुराने भारतीय इतिहास की तस्वीर बदल दी। लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। 1839 में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े, नौकरी छोड़नी पड़ी और 1840 में केवल 41 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

धम्मलिपि को पढ़ने और उनकी मृत्यु के बीच केवल तीन साल का अंतर था, लेकिन इस छोटे से समय में उन्होंने भारत को सम्राट अशोक जैसा महान व्यक्तित्व लौटा दिया।

★भारत का गौरवशाली अतीत

प्रिंसेप की खोज ने न सिर्फ सम्राट अशोक को इतिहास के पन्नों पर पुनः स्थापित किया, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की महानता को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। आज भी जब हम अशोक स्तंभ, शिलालेख और धम्मचक्र की बात करते हैं, तो जेम्स प्रिंसेप का नाम स्वतः स्मरण हो आता है।

★निष्कर्ष

20 अगस्त को हम सब भारतीय जेम्स प्रिंसेप की जयंती पर उन्हें नमन करते हैं। उनके अथक प्रयासों और अद्भुत विद्वता ने हमें हमारे गौरवशाली अतीत से जोड़ा और यह सिखाया कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि पत्थरों पर लिखे अक्षरों में भी जीवित रहता है।