नई दिल्ली:(द दस्तक 24 न्यूज़) 07 अगस्त 2025 देश की डिजिटल भुगतान क्रांति की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर एक अहम बयान सामने आया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि भविष्य में UPI ट्रांजेक्शन हमेशा मुफ्त नहीं रह सकते, और अंततः इसकी लागत उपभोक्ताओं या व्यवसायों को वहन करनी पड़ सकती है।
गवर्नर मल्होत्रा ने यह टिप्पणी बुधवार को मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में की। उन्होंने स्पष्ट किया, “यह अभी भी मुफ्त नहीं है, इसे कोई न कोई भुगतान कर रहा है। सरकार इसे सब्सिडी दे रही है, लेकिन कहीं न कहीं इसकी लागत चुकाई जा रही है।”
क्या उपभोक्ताओं पर पड़ेगा असर?
जब उनसे पूछा गया कि क्या भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अन्य शुल्क आम उपभोक्ताओं पर लगाए जा सकते हैं, तो उन्होंने दो टूक कहा – “लागत होती है और ये लागत किसी न किसी को चुकानी ही पड़ती है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि “यह महत्वपूर्ण है कि कौन भुगतान करता है, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि कोई तो बिल चुकाए।”
गौरतलब है कि जनवरी 2020 से UPI ट्रांजेक्शन को MDR से छूट मिली हुई है, जिससे यह सेवा अभी तक आम जनता के लिए नि:शुल्क बनी हुई थी। लेकिन अब जब कुछ निजी बैंक UPI ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाने लगे हैं, तो यह मॉडल अस्थिर होता नजर आ रहा है।
ICICI बैंक ने शुरू किया शुल्क लेना
01 अगस्त 2025 से ICICI बैंक ने PhonePe और Google Pay जैसे पेमेंट एग्रीगेटर्स से प्रति ट्रांजेक्शन शुल्क लेना शुरू कर दिया है। यह कदम UPI के नि:शुल्क मॉडल की दिशा में पहला बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
रिकॉर्ड तोड़ रहा है UPI
इन चर्चाओं के बीच, UPI ने एक और नया कीर्तिमान स्थापित किया है। 2 अगस्त 2025 को UPI पर 700 मिलियन से अधिक ट्रांजेक्शन हुए, जो इसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता और मजबूती को दर्शाता है। वहीं जुलाई 2025 में UPI ने कुल 19.47 बिलियन ट्रांजेक्शन को संसाधित किया, जिनका कुल मूल्य 25.1 लाख करोड़ रुपये रहा। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 35% अधिक है।
आगे क्या?
RBI गवर्नर की इस टिप्पणी के बाद डिजिटल पेमेंट्स की दिशा और भविष्य को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अगर UPI पर शुल्क लागू होते हैं, तो इससे उपभोक्ताओं के व्यवहार पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, छोटे व्यापारियों और दैनिक उपयोगकर्ताओं के लिए यह एक नई चुनौती बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और नियामक संस्थाओं को डिजिटल भुगतान के इस सफल मॉडल की स्थिरता बनाए रखने के लिए संतुलित नीति बनानी होगी, जिससे सेवा प्रदाता कंपनियों की लागत भी निकले और आम जनता पर अनावश्यक भार भी न पड़े।
