पीलीभीत: तहसील क्षेत्र में स्कूलों की किताबों के दाम छू रहे आसमान, पढ़ाई के नाम पर मचाई लूट कैसे पढ़ेंगे मध्यमवर्गीय लोगों के बच्चे

पूरनपुर/पीलीभीत
बर्तमान में लोगों को अपने बच्चों को पढ़ाना बड़ा कठिन हो गया है एक तरफ तो मंहगाई और ऊपर से स्कूलों की मन मानी ! सरकार भले ही नई शिक्षा नीति से तमाम परिवर्तन का ढिंढोरा पीट रही हो। लेकिन निजी स्कूलों पर निगरानी का कोई तंत्र नहीं है। ज्यादातर जगहों पर अभिभावकों को किताबें स्कूल के अंदर से या मनचाही दुकानों पर उपलब्ध कराई जा रही है। अब किताबें बेचने के तरीकों में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब यह किताबें मिलने का स्थान स्कूल प्रबंधक खुद ही बता रहे है।अभिभावक जब बच्चों को दाखिला दिलाने जाते है तो ठिकाने की जानकारी दे दी जाती है। ये काम ज्यादातर उन स्कूलों में हो रहा है! प्राइवेट स्कूलों की मनमानी तो यह है कि यह हर वर्ष नए सिलेबस की किताबें लगा रहे है। ऐसे में अगर किसी का बच्चा दूसरी कक्षा में पढ़ता है तो पहली कक्षा वाले बच्चे के काम यह किताबें नही आएंगी। पूरनपुर तहसील क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्राईवेट स्कूल संचलित हो रहे है। कई स्कूल ऐसे है जिनकी मान्यता कक्षा 5 से 8 तक की है। लेकिन ऐसे स्कूलों में हाईस्कूल से इंटर तक कक्षाएं संचालित हो रही है। सेहरामऊ क्षेत्र में जोगराजपुर, गोरा, रायपुर, केसरपुर, गढ़ाकलां, शाहगढ़, कलीनगर, रमनगरा, शिवनगर, कसकंजा,चंदिया हजारा, सहित नगर पूरनपुर में नामचीन प्राईवेट स्कूल तमाम जगह प्राईवेट स्कूल चल रहे है। जिनमें मानक विहीन कक्षाएं संचालित हो रही है। नया शैक्षिक सत्र एक अप्रैल से शुरू हो चुका है। सरकार स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकें चलाने पर जोर दे रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी इस बात पर जोर दिया गया है। लेकिन निजी प्रकाशकों को अबैध तरीकों से लाभ पहुंचाने और खुद के कमीशन के चक्कर में निजी स्कूल एनसीईआरटी की किताबों से दूरी बनाए हैं। तहसील क्षेत्र के कुछ नामचीन स्कूलों ने कोर्स में दिखावे के लिए चंद एनसीईआरटी की किताबें शामिल कर ली गई हैं, ताकि आरोपों से बचा सके। परन्तु अभी तक शिक्षा विभाग ने किसी भी निजी स्कूल पर कार्रवाई नहीं की है! जबकि अधिकारियों को केवल स्कूल में जाकर छापेमारी करनी चाहिए उन्हें किताबों के ढेर मिल जाएंगे!वहीं स्कूलों में भी पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता के कोई मानक तय नहीं है। यहां कम शैक्षिक योग्यता वाले अप्रशिक्षित युवक-युवतियों को शिक्षण कार्य में लगाया जाता है।इससे इस तरह के शिक्षकों को कम बेतन देकर अधिक मुनाफा कमा लेते हैं! इस कारण इन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।जबकि किताबो में चल रहा 50 प्रतिशत कमीशन का खेल है लेकिन कार्रवाई के नाम पर शिक्षा विभाग फेल नजर आ रहा है। जिन स्कूलों में बच्चो को एनसीईआरटी की किताबें लगानी चाहिए, व निजी प्रकाशकों की किताबें पढ़ने को मजबूर कर रहे है! क्योंकि प्रकाशकों की और से स्कूल संचालकों को मोटा कमीशन दिया जा रहा है। यह कमीशन 40 से 50 प्रतिशत तक है। किताबें कौन से प्रकाशक की लगेगी यह भी कमीशन पर निर्भर है। बल्कि स्कूल में बच्चों को जो किताब 50 रुपये में मिलनी चाहिए उसे प्राइवेट स्कूल 100 लेकर 300 रुपये में देते हैं और फीस मनमानी लेते हैं। इस बात की जांच होनी चाहिए कि प्राइवेट स्कूल बच्चे को किस कीमत पर किताबें दे रहे हैं और सरकारी स्कूल में वही किताबें किस दर पर मिलती है।आम गरीब को मजबूरी में प्राइवेट स्कूलों में जाना पड़ता है। शिक्षा इतनी महँगी हो गई है कि आम गरीब को कर्जा लेकर अपने बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है। वहीं सरकारी नीतियों के बिपरीत और मन मुताबिक ग्रामीणों से फीस के नाम पर लूट के साथ साथ मोटी धनराशि लेकर छात्र छात्राओं के अभिवावकों को लूटने का कार्य किया जा रहा है। वहीं क्षेत्रीय जनता के मुताबिक शहर व नगर में संचालित शिक्षा के नाम पर अधिकारियों की लापरवाही से स्कूल संचालकों द्वारा लूटमार का खेल खेला जा रहा है।

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