कन्नौज:”मक्का पट्टी” पर किसानों की व्यथा, सड़क पर मक्का सुखाना बनी मजबूरी, सरकार कब लेगी ठोस कदम ?

कन्नौज:(द दस्तक 24 न्यूज़) 22 जून 2025 उत्तर प्रदेश में इन दिनों एक अजीबोगरीब लेकिन चिंताजनक स्थिति देखने को मिल रही है जहां एक तरफ राज्य सरकार कृषि विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर किसान सड़क पर मक्का सुखाने को मजबूर हैं। स्थानीय किसानों ने व्यंग्य में इसे “मक्का पट्टी” नाम दिया है। ये नज़ारा तब और चर्चा में आया जब माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने हाल ही में एक क्षेत्रीय दौरे के दौरान हवाई निरीक्षण किया, जिसमें यह दृश्य हवाईपट्टी की बजाय सड़क पर फैली मक्का की पट्टी के रूप में दिखा।

“मक्का पट्टी” क्यों बनी ज़रूरत?

गांवों में समुचित अनाज सुखाने की समतल भूमि, थ्रेसिंग यार्ड या कृषि शेड की भारी कमी है। इस कारण, किसान मजबूरी में सड़कों पर ही मक्का सुखाते हैं। मक्का एक ऐसा अनाज है जिसे तेज़ धूप और खुली हवा में सुखाना जरूरी होता है, अन्यथा उसमें फफूंद और नुकसान की आशंका बढ़ जाती है। लेकिन इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण किसान अब सड़कों पर ही अपने फसल को फैलाकर “खेत की जगह सड़क” का उपयोग करने लगे हैं।

किसानों की पीड़ा:

स्थानीय किसान रामस्वरूप यादव बताते हैं,

“जब हमारे पास ज़मीन का छोटा टुकड़ा ही है, और कोई सार्वजनिक सुखाने का स्थान नहीं है, तो सड़क ही एकमात्र विकल्प बचता है। लेकिन ट्रैक्टर, बसें और बाइक जब मक्का के ऊपर से निकलती हैं तो फसल बर्बाद हो जाती है। फिर प्रशासन जुर्माना भी लगाता है।”

दूसरे किसान महेश सिंह ने बताया,

“हम कोई खुशी से सड़क पर मक्का नहीं सुखाते। यह हमारी मजबूरी है। सरकार या तो सुखाने के लिए समतल भूमि उपलब्ध कराए या फिर कोल्ड स्टोरेज जैसे विकल्प विकसित करे।”

यातायात और सुरक्षा पर असर:

मक्का पट्टी न सिर्फ किसानों के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सड़क पर चल रहे वाहन चालकों के लिए भी खतरनाक है। ट्रैक्टर या ट्रक मक्का पर से फिसल सकते हैं, जिससे दुर्घटनाएं होने की आशंका रहती है। कई जगहों पर पहले से ही सड़कें संकरी हैं, ऐसे में उन पर मक्का फैलाकर सुखाना यातायात बाधित करता है और कभी-कभी पुलिस किसानों के खिलाफ कार्यवाही भी कर देती है।

राजनीतिक सवाल: भाजपा को किसानों की चिंता क्यों नहीं?

किसानों का सवाल है कि भाजपा सरकार जो कृषि बजट और योजनाओं की बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है, वह जमीनी हकीकत को कब समझेगी?

एक स्थानीय किसान नेता ने तंज करते हुए कहा,

“मुख्यमंत्री जी ने ‘हवाई सर्वेक्षण’ किया, लेकिन उन्हें कभी ये ‘मक्का पट्टी’ सड़क पर दिखी क्या? शायद नहीं, क्योंकि सच्चाई ज़मीन पर है, हवा में नहीं।”

समाधान क्या हो सकता है?

प्रत्येक गांव में सामुदायिक अनाज सुखाने का यार्ड मिनी-कोल्ड स्टोरेज और सुखाने की मशीनों की उपलब्धता सरकारी स्कूल या पंचायत भवन के आसपास अस्थायी सुखाने की सुविधा ग्राम पंचायतों को अनुदान देकर सुखाने के स्थान विकसित करना

निष्कर्ष:

किसानों की यह पीड़ा कोई ‘हवा-हवाई’ मुद्दा नहीं है। यह एक ज़मीनी सच्चाई है जो सरकार की नीति और जमीनी क्रियान्वयन के बीच की खाई को उजागर करती है। किसानों को सुरक्षित, सम्मानजनक और तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए ‘मक्का पट्टी’ जैसी मजबूरियों को खत्म करना अनिवार्य है। कृषि यदि ‘अर्थव्यवस्था की रीढ़’ है, तो किसानों की ये स्थिति उस रीढ़ को झुका रही है। सरकार को अब कागज़ी योजनाओं से बाहर आकर खेत और किसान की असल ज़रूरतों पर ध्यान देना चाहिए।