फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 27 दिसंबर 2025 जनपद का 311वां स्थापना दिवस जश्न-ए-फर्रुखाबाद के रूप में पूरे हर्षोल्लास, जोश और गंगा-जमुनी तहजीब की भावना के साथ मनाया गया। यह भव्य आयोजन बारहदरी मऊदरवाजा स्थित सोसायटी नवाब मोहम्मद खां बंगश के कार्यालय पर संपन्न हुआ, जिसमें जिले और आसपास के क्षेत्रों से आए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के वंशजों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और गणमान्य नागरिकों ने बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया।
कार्यक्रम में शाहजहांपुर से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अशफाक उल्ला खान साहब के पुत्र, रामपुर से जावेद शाह खान, स्वतंत्रता सेनानी महावीर राठौर की भतीजी स्नेहलता राठौर, गढ़ी कोहना से अशरफ हुसैन तथा जिले के प्रख्यात इतिहासकार डॉ. अनवर हुसैन खान ने अपने विचार व्यक्त कर फर्रुखाबाद के गौरवशाली इतिहास को जीवंत किया।
इस अवसर पर अशफाक उल्ला खान ने कहा कि “अपने बुजुर्गों की कुर्बानियों को कभी भुलाकर नहीं, बल्कि अपने आचरण और कर्मों से जिंदा रखना चाहिए।” उन्होंने युवाओं से इतिहास को जानने और उससे प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
नगर पंचायत शमशाबाद के अध्यक्ष पति श्री नदीम अहमद फारूकी ने अपने संबोधन में कहा कि “हमें अपना इतिहास कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि इतिहास ही हमारी पहचान और दिशा तय करता है।”
वहीं, सोसायटी के महासचिव एडवोकेट सलीम राजा ने कहा कि “फर्रुखाबाद सदैव गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल रहा है। आपसी भाईचारे, सद्भाव और सांस्कृतिक एकता की यह परंपरा आगे भी कायम रहनी चाहिए।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अनवर अहमद खान ने की, जबकि संचालन महासचिव एडवोकेट सलीम राजा द्वारा किया गया। अध्यक्ष नवाब काजिम हुसैन खां बंगश ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
इस आयोजन में सोसायटी के उपाध्यक्ष अनीश अहमद एडवोकेट, संयुक्त सचिव जावेद खान बंगश, कोषाध्यक्ष मुफीद खान, आशिफ खान, बिलाल शफ़ीकी, रामकृष्ण राजपूत, उपाध्यक्ष जवाहर सिंह गंगवार, मीडिया प्रभारी वसीम जमा खान, सिद्दीकी अहमद अंसारी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
पूरे कार्यक्रम के दौरान फर्रुखाबाद के गौरवशाली अतीत, स्वतंत्रता संग्राम में जिले की भूमिका और सामाजिक समरसता की परंपरा पर विस्तार से चर्चा हुई। जश्न-ए-फर्रुखाबाद न केवल उत्सव का अवसर रहा, बल्कि इतिहास, संस्कृति और भाईचारे को सहेजने का एक सशक्त संदेश भी देकर गया।
