फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 06 जुलाई 2025 शाक्य, कुशवाहा, मौर्य, सैनी समाज के लोग अपने गौरवशाली अतीत, समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर को पहचानें, उस पर गर्व करें, और नई पीढ़ी को भी उसकी सही जानकारी दें। इस दिशा में पहला कदम है पालि भाषा और धम्म का अध्ययन, जो सीधे-सीधे भगवान बुद्ध के वचनों और उनके सिद्धांतों से जोड़ता है।
पालि भाषा: संस्कृति से रोजगार तक
पालि भाषा न केवल बौद्ध धम्म की मूल भाषा है, बल्कि अब यह रोजगार और शैक्षणिक अवसरों का माध्यम भी बनती जा रही है। भारत सरकार द्वारा पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जा चुका है। देश के ७३ शिक्षा बोर्डों में से ११ बोर्ड ने कक्षा ६ से पालि भाषा शिक्षण आरंभ करने हेतु लिखित सहमति दी है। इससे युवाओं के लिए इस क्षेत्र में स्वर्णिम भविष्य के द्वार खुल रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर हो रहा पालि शिक्षण
फर्रुखाबाद स्थित अभिधम्म नगरी संकिसा के निवासी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यहां गत चार महीनों से पालि भाषा कार्यशाला चल रही है, जिसमें कई विद्यार्थी नियमित रूप से अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही, प्रयागराज बोर्ड से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के पालि विषय की तैयारी भी कराई जा रही है।
उच्च शिक्षा की दिशा में कदम
समाज के प्रयासों से केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ में इस वर्ष चार विद्यार्थियों ने एम.ए. पालि में प्रवेश लिया है, जो इस आंदोलन की सफलता और भविष्य की संभावनाओं का संकेत है। साथ ही, डॉ. सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से षट्मासिक ऑनलाईन पालि भाषा कोर्स भी संचालित हो रहा है, जिसमें सम्मिलित होकर विद्यार्थी धम्म एवं पालि का आधारभूत ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
एक नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व
श्री सुभाष चन्द्र शाक्य अध्यापक ने कहा कि हम सूर्यवंशी क्षत्रिय शाक्य हैं, भगवान बुद्ध के वंशज हैं। इसलिए हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम पालि भाषा, धम्म और बुद्ध वचन का मूल रूप में अध्ययन करें। इससे न केवल हमारे भीतर आत्मगौरव की भावना आएगी, बल्कि हम रोजगार और जीवन की गुणवत्ता के क्षेत्र में भी आगे बढ़ सकेंगे।
धम्म का मार्ग: शांति, समता और सम्मान की ओर
पालि भाषा और धम्म का अध्ययन केवल एक भाषाई या धार्मिक कार्य नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा रास्ता है जो आत्मिक शांति, सामाजिक समता और श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की ओर ले जाता है।
