फर्रुखाबाद:भाजपा विधायक व प्रशासनिक संरक्षण में फल-फूल रहा ‘ठाकुर शिक्षा माफिया’?

फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 15 जनवरी 2026 प्रदेश सरकार जहां ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘रामराज्य’ का दावा कर रही है, वहीं जनपद के अमृतपुर क्षेत्र में एक कथित शिक्षा माफिया खुलेआम सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर विद्यालय संचालित कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायतों, जांच रिपोर्ट और दस्तावेजी साक्ष्यों के बावजूद जिला प्रशासन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सका है।

45 साल से बंजर सरकारी भूमि पर अवैध विद्यालय

मामला जनता भारतीय विद्यालय, भरखा से जुड़ा है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार जिस भूमि पर यह विद्यालय संचालित है, उसका पट्टा वर्ष 1971 में हुआ था, जिसे वर्ष 1980 में निरस्त कर दिया गया। नायब तहसीलदार अमृतपुर की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि यह भूमि श्रेणी 6-2 की सरकारी (बंजर) संपत्ति है। इसके बावजूद बीते 45 वर्षों से यहां बिना किसी वैधानिक अनुमति के विद्यालय चलाया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भूमि ही अवैध पाई गई, तो शिक्षा विभाग और जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय ने इस संस्था को मान्यता कैसे दे दी?

नियुक्तियों में मनमानी, नियमों की उड़ाई धज्जियां

विद्यालय प्रबंधन पर नियुक्तियों में भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं। सूत्रों के अनुसार तत्कालीन प्रबंधक ने अपने ही पुत्र अनिल कुमार की नियुक्ति लिपिक पद पर कर दी, जबकि इसके लिए उनके पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।

इतना ही नहीं, प्रधानाध्यापक प्रेमपाल द्वारा नियुक्ति के लगभग एक वर्ष बाद बीएड की डिग्री जमा की गई, जो नियमों के उल्लंघन और संभावित फर्जीवाड़े की ओर इशारा करती है।

गरीब बच्चों से अवैध फीस वसूली

बाढ़ प्रभावित और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों से फीस के नाम पर लाखों रुपये की अवैध वसूली किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। अभिभावकों का कहना है कि न तो कोई रसीद दी जाती है और न ही इसका कोई लेखा-जोखा सरकारी अभिलेखों में दर्ज है।

चौथे स्तंभ पर हमला: पत्रकार को फंसाने की कोशिश

जब चक्षु न्यूज़ के संपादक श्याम सिंह यादव ने इस पूरे प्रकरण को जनहित में उजागर किया, तो विद्यालय प्रबंधन ने सच दबाने के लिए कथित तौर पर पत्रकार पर 5 लाख रुपये की रंगदारी और विज्ञापन के नाम पर उगाही का झूठा आरोप लगा दिया।

हालांकि पुलिस द्वारा की गई जांच में इन आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह पत्रकार को डराने और आवाज दबाने की साजिश थी।

भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर सवाल

स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि क्या कार्रवाई जाति और प्रभाव देखकर की जा रही है। लोगों का कहना है कि यदि यही विद्यालय किसी दलित, पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा होता, तो अब तक बुलडोजर की कार्रवाई हो चुकी होती। लेकिन कथित ठाकुर प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण के चलते 11 से अधिक शिकायतों के बावजूद प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है।

प्रेस परिषद में शिकायत, FIR की मांग

संपादक श्याम सिंह यादव ने इस पूरे मामले की शिकायत भारतीय प्रेस परिषद (PCI) से की है और संबंधित विद्यालय प्रबंधन तथा भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग उठाई है। मामले के उजागर होने के बाद प्रशासनिक गलियारों में हलचल जरूर है, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई अब भी नदारद है।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार अपने ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे को ज़मीन पर उतारेगी या यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा?