फर्रुखाबाद (द दस्तक 24 न्यूज़) 11 अगस्त 2025 ज़िले के गंगापार क्षेत्र के लिए बाढ़ अब कोई अनजाना खतरा नहीं, बल्कि हर साल आने वाला दर्द बन चुकी है। बरसात के मौसम में नरोरा बांध से छोड़ा गया लाखों क्यूसेक पानी गंगा नदी में उफान ला देता है। बिना ठोस योजना, समुचित चेतावनी और तैयारी के छोड़ा गया यह पानी गंगापार के गांवों में तबाही का कारण बनता है। नतीजा—पानी के साथ घर, खेत, पशुधन और रोज़गार सब बह जाते हैं, और पीछे रह जाती है सिर्फ बेबसी और मुआवजे की लंबी प्रतीक्षा।
★गांवों में बर्बादी का मंजर
गंगापार के गांवों में बाढ़ का असर सिर्फ जलभराव तक सीमित नहीं होता। कई परिवारों के पक्के मकान तक पानी में गिर जाते हैं। गेंहू, धान, आलू जैसी फसलें बर्बाद हो जाती हैं। पशु चारा खत्म हो जाता है और दर्जनों मवेशी पानी में बह जाते हैं। सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे राहत और बचाव कार्य तक पहुंचने में देरी होती है।
★प्रशासन की भूमिका—आंकड़ों में सीमित कार्रवाई
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन की सक्रियता अक्सर कागज़ों तक सीमित रहती है। जलस्तर नापना, रिपोर्ट बनाना और आपदा के बाद मुआवजे की प्रक्रिया शुरू करना ही मुख्य कार्य रह जाता है। लेकिन न तो पहले से कोई ठोस बाढ़ नियंत्रण योजना बनाई जाती है, न ही गांवों में समय से चेतावनी पहुंचती है।
★स्थायी समाधान की ज़रूरत
बाढ़ को सिर्फ “प्राकृतिक आपदा” मानना अब समाधान नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए स्थायी और सख्त कदम उठाना ज़रूरी है—
मजबूत तटबंध और बांध: नदी किनारे मज़बूत तटबंध और पक्के बांध बनाए जाएं ताकि पानी की मार सीधे गांवों तक न पहुंचे।
अलर्ट सिस्टम: नरोरा बांध से पानी छोड़े जाने से पहले गांव-गांव तक समय पर चेतावनी पहुंचाने का आधुनिक और तेज़ सिस्टम तैयार हो।
सुरक्षित निकासी व्यवस्था: बाढ़ की स्थिति में लोगों, पशुओं और आवश्यक सामान की सुरक्षित निकासी के लिए नाव, ट्रैक्टर और शेल्टर हाउस की उपलब्धता हो।
तत्काल मुआवजा व पुनर्वास: बाढ़ प्रभावित परिवारों को बिना देरी के आर्थिक सहायता और पुनर्वास पैकेज मिले, जिससे वे अपनी जिंदगी दोबारा शुरू कर सकें।
★लोगों का भरोसा दांव पर
अगर हर साल की तरह सिर्फ रिपोर्ट और बैठकें होती रहीं, तो गंगापार के लोगों का प्रशासन पर से भरोसा खत्म हो जाएगा। बाढ़ को रोकना भले पूरी तरह संभव न हो, लेकिन इसके असर को कम करना और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
अब वक्त है कि बाढ़ को सिर्फ मौसम की मार मानकर अनदेखा न किया जाए, बल्कि इसे एक गंभीर मानवीय और विकासात्मक चुनौती मानकर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। वरना गंगापार के लोगों का सब्र और उम्मीद दोनों बहते पानी के साथ डूबते रहेंगे।
