फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 09 जनवरी 2026 भगवान बुद्ध के पंचशील में जीवन जीने का प्रथम और मूल मापदंड बताया गया है—हिंसा से विरत रहना। तथागत ने समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री, दया और करुणा का भाव रखने का संदेश दिया। उनके अनुसार अहिंसा केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का मूल कार्य है। प्रकृति, प्राणी और मानव—तीनों के संरक्षण में ही जीवन की सार्थकता है।
अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं
अक्सर अहिंसा को कमजोरी या पलायनवाद के रूप में समझ लिया जाता है, जबकि बुद्ध का संदेश इससे कहीं अधिक गहन और यथार्थवादी था। तथागत ने अन्याय, अत्याचार और अधर्म के समक्ष झुकने की शिक्षा कभी नहीं दी। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—दंडनीय को दंड मिले और उपहार योग्य को उपहार।
बुद्ध कहते थे—“बुराई से भलाई को जीतो”, पर उन्होंने यह कभी नहीं सिखाया कि बुराई को भलाई पर हावी होने दिया जाए। भलाई की रक्षा के लिए, मर्यादा, न्याय और सामाजिक अनुशासन की स्थापना हेतु कठोरता आवश्यक हो सकती है। दंड ऐसा होना चाहिए जिससे अपराधी को अपने अपराध का बोध हो जाए।
हिंसा और अहिंसा की विवेकपूर्ण सीमा
बुद्ध ने सभी प्राणियों पर करुणा रखने का आग्रह इसलिए किया, ताकि मनुष्य को अपराध करने की आवश्यकता ही न पड़े। परंतु जहां जीवन, समाज और न्याय की रक्षा का प्रश्न आता है, वहां तथागत ने मौन रखा—क्योंकि उनका विश्वास था कि एक योगपुरुष नैतिक विवेक से यह निर्णय लेने में सक्षम होगा कि कहां अहिंसा और कहां नियंत्रित कठोरता आवश्यक है।
बुद्ध ने अहिंसा को जीवन का पथ बताया, पर जीवन के पथ को साफ रखने और अहिंसा को नियम बनाने में अंतर भी स्पष्ट किया। पथ की शुद्धि के लिए, अवरोध हटाने के लिए, कभी-कभी कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं।
आज का विश्व और बुद्ध का संदेश
आज मानव की भावनाएँ बदल गई हैं। छोटी सी बात पर पत्थर का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता बनती जा रही है। इसी सोच के कारण पूरा विश्व मानो बारूद के ढेर पर बैठा है। ऐसे नाजुक समय में बुद्ध का दर्शन फिर से प्रासंगिक हो उठा है।
भारत में यह पुनर्जागरण बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के माध्यम से हुआ, जिन्होंने संविधान और बुद्ध धर्म के जरिए अहिंसा, समानता और न्याय की लौ पुनः प्रज्वलित की। महात्मा गांधी ने भी बुद्ध के अहिंसा संदेश को वैश्विक मंच पर नई शक्ति प्रदान की।
भारत: अहिंसा का पक्षधर, पर पराजय नहीं
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी विश्व में बुद्ध और उनकी शिक्षाओं की वकालत करता है। वह विश्व को अहिंसा का संदेश देता है, लेकिन जब आवश्यकता पड़ती है तो कारगिल युद्ध जैसे उदाहरणों से यह भी स्पष्ट करता है कि भारत अन्याय के सामने झुकने वाला देश नहीं है।
हम हिंसा में विश्वास नहीं रखते, लेकिन हार मानना भी हमारा धर्म नहीं। मिटना या मिटाना—यह अंतिम विकल्प होता है, जब न्याय, मर्यादा और अस्तित्व पर संकट हो।
राज्य, न्याय और दंड का बौद्ध दृष्टिकोण
यदि बुद्ध केवल पूर्ण निष्क्रिय अहिंसा का संदेश देते, तो कोई भी राजा अपने राष्ट्र को बौद्ध राष्ट्र घोषित नहीं करता। क्योंकि बिना दंड के न्याय संभव नहीं। राजा का न्यायप्रिय होना प्रजा को प्रिय होता है, और न्याय में दंड निहित होता है। दंड कठोर हो सकता है, पर वह समाज को सही दिशा देता है।
बुद्ध ने कोमलता और कठोरता—दोनों का संतुलन सिखाया। कठोरता के लिए तपस्या आवश्यक है, और तपस्या जीवन को अनुशासित बनाती है। ऐसा जीवन ही संसार की रचना करता है, जिसमें सुख-दुख दोनों हैं, और जिनके निवारण का मार्ग बुद्ध ने बताया—जो अमूल्य और अलौकिक है।
अनुशासित अहिंसा: बुद्ध का मूल संदेश
तथागत की अहिंसा दुराचार सहने की शिक्षा नहीं देती। यह अनुशासित अहिंसा है। अनुशासित व्यक्ति स्वयं हिंसा नहीं करता, और दूसरों से भी अनुशासन की अपेक्षा करता है। बुद्ध का ज्ञान अंधकार में प्रकाश है—सोए को जगाने वाला, ढके को खोलने वाला।
बाबा साहब अंबेडकर ने बुद्ध के इस ज्ञान को अपनी रचनाओं में अत्यंत स्पष्टता और वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया। ऐसा प्रतीत होता है मानो तथागत स्वयं बाबा साहब के रूप में पुनः ज्ञान-सूर्य बनकर उदित हुए हों, जिनकी लालिमा आज पूरे विश्व को आलोकित कर रही है।
निष्कर्ष
आज विश्व में धर्म की एक नई वैचारिक जंग छिड़ी हुई है। इस संघर्ष में यदि कोई मार्ग मानवता को बचा सकता है, तो वह है—बुद्ध, धर्म और संघ का मार्ग।
जीवन हर कदम पर एक नई चुनौती है, लेकिन यदि हम बुद्ध के सिद्धांतों के साथ हैं, तो जीत निश्चित है।
✍️ लेखक:
महेंद्र सिंह शाक्य
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