नई दिल्ली:दीपदानोत्सव पर्व का वास्तविक इतिहास: पाली ग्रंथों में मिलता है प्रमाण, न कि किसी धार्मिक शास्त्र में “दीपावली” का उल्लेख

नई दिल्ली: समाज में इन दिनों यह भ्रम तेजी से फैलाया जा रहा है कि “दीपावली” ही असली पर्व है, जबकि कुछ इसे “दीपोत्सव” या “दीपदानोत्सव” कहते हैं। कई धार्मिक मठाधीशों ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि यह न “दीपावली” है न “दीपोत्सव”, बल्कि बाद की मान्यता है।

लेकिन जब प्रमाणों की बात आती है तो सत्य पाली साहित्य में स्पष्ट रूप से “दीपोत्सव” अथवा “दीपदानोत्सव” पर्व के रूप में वर्णित मिलता है — न कि “दीपावली” नाम से।

🔹 पाली ग्रंथ “दीपवंस” में दीपोत्सव का उल्लेख

पाली साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ “दीपवंस” (पेज नं. 132–134) में भगवान बुद्ध और राजा अशोक द्वारा मनाए गए दीपदानोत्सव का विस्तार से वर्णन मिलता है।

ग्रंथ में कहा गया है कि भगवान ने चौरासी हजार (84,000) धर्मस्कंध कहे थे। राजा अशोक ने इन धर्मस्कंधों की स्मृति में 84,000 विहार (आराम) बनवाने का संकल्प लिया और जब यह निर्माणकार्य पूर्ण हुआ तो कार्तिक अमावस्या से पूजा-सप्ताह (दीपोत्सव) मनाया गया।

 दीपवंस श्लोक (94–98):

“चतुरासीतिसहस्सानि परिपुण्णं अनूनकं । देसितं बुद्धसेट्ठस्स धम्मक्खन्धं महारहं ॥94॥

…अन्तो तीणि च वस्सानि विहारं कत्वान खत्तियो परिनिद्विते आरामे पूजं सत्ताह कारयि ॥98॥”

इससे स्पष्ट होता है कि कार्तिक अमावस्या से प्रारंभ हुआ यह “पूजा-सप्ताह” ही आगे चलकर दीपदानोत्सव पर्व के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

🔹 दीपदान और स्तूप-पूजन का वर्णन

दीपवंस (पेज नं. 230–231) में उल्लेख है कि इस अवधि में अनेक स्तूपों और विहारों को दीपों से सजाया गया। चारों दिशाओं में दीपमालाएं जलाई गईं और नगर स्वर्ण, रजत व रत्नमालाओं से सुसज्जित किए गए।

 “थूपट्टाने चतुद्दिसा पदीपेहि विभातका।

सतरंसि उदेन्तो वो पसोभन्ति समन्ततो॥30॥”

यह दृश्य एक दीपमाला महोत्सव का था — जिसे आज के समय में “दीपदानोत्सव” कहा जाता है।

🔹 महावंस ग्रंथ में राजा अशोक द्वारा दीपोत्सव का वर्णन

पाली ग्रंथ महावंस (पेज नं. 48–49) में भी इस पर्व का विस्तृत वर्णन मिलता है।

राजा अशोक ने चौरासी हजार विहारों के निर्माण उपरांत सप्ताह भर का दीपोत्सव महोत्सव मनाने का आदेश दिया था।

उन्होंने समस्त नगरों में आदेश प्रसारित करवाया कि:“आज से सातवें दिन सभी देशों में, सभी स्थानों पर, सब आरामों का महोत्सव मनाया जाए… दीपमाला और पुष्पमाला से अलंकृत कर, नाना वाद्यों के सहित अनेक प्रकार के उपहारों को लेकर लोग उपोसथ-व्रत धारण करें, धर्म सुनें और पूजा करें।”

इस आयोजन को ही आगे चलकर दीपदानोत्सव या दीपोत्सव पर्व के रूप में परंपरा मिली।

🔹 बौद्ध युगीन “दीपदानोत्सव” ही बाद में “दीपावली” बना

इतिहासकारों का मत है कि पाली ग्रंथों में वर्णित यह दीपदानोत्सव या स्तूप-महोत्सव ही समय के साथ रूपांतरित होकर लोक परंपराओं में “दीपावली” कहलाने लगा।

किन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि किसी भी वैदिक, ब्राह्मण या हिन्दू धार्मिक ग्रंथ (मनुस्मृति, उपनिषद, गीता आदि) में “दीपावली” नामक पर्व का उल्लेख नहीं मिलता।

🔹 निष्कर्ष: प्रमाण पाली ग्रंथों में, भ्रम समाज में

पाली ग्रंथों — दीपवंस और महावंस — में दिए गए प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि “दीपोत्सव” या “दीपदानोत्सव” ही मूल ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्व है, जो बौद्ध परंपरा से जुड़ा है।

इसलिए “दीपावली” को “हिन्दू पर्व” कहकर प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से गलत और प्रमाणविहीन है।

🪔दीपदानोत्सव_पर्व — करुणा, दान और प्रकाश का उत्सव

यह पर्व न केवल दीपों का, बल्कि ज्ञान और करुणा के प्रकाश का प्रतीक है — वही प्रकाश जो अशोक और बुद्ध के समय जम्बुद्वीप में फैला था।

आज भी जब दीप जलाएं, तो याद करें कि यह परंपरा बुद्धकालीन “दीपदानोत्सव” से ही प्रारंभ हुई थी।