फर्रूखाबाद:ब्राह्मणवाद के विरुद्ध महात्मा फुले का चिंतन: धर्म नहीं, धंधा है!

फर्रुखाबाद:(द दस्तक 24 न्यूज़) 26 जून 2025 “बाल काटना नाई का धर्म नहीं, धंधा है। चमड़े की सिलाई करना मोची का धर्म नहीं, धंधा है। ठीक उसी प्रकार पूजा-पाठ करना और करवाना ब्राह्मण का धर्म नहीं, बल्कि धंधा है।” यह वाक्य न सिर्फ एक कथन है, बल्कि सामाजिक क्रांति की मशाल है, जिसे प्रख्यात समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा राव फुले ने जलाया था।

महात्मा फुले का यह बयान समाज की उस जड़ पर चोट करता है, जहाँ धर्म के नाम पर व्यवसाय खड़ा किया गया और शोषण को धार्मिक कर्तव्य का नाम देकर न्यायोचित ठहराया गया। उन्होंने न सिर्फ जातिवादी पाखंड को उजागर किया बल्कि समाज के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, आत्म-सम्मान और अधिकार की राह दिखाई।

धार्मिक व्यवसाय बनाम सामाजिक न्याय

भारत में लंबे समय तक धर्म को कुछ वर्गों ने अपने वर्चस्व का हथियार बना रखा था। पूजा-पाठ, संस्कार, कर्मकांड जैसे विषयों को ब्राह्मण वर्ग ने अपने विशेषाधिकार के रूप में स्थापित कर लिया और उसे ‘धर्म’ का नाम दे दिया। फुले ने इस सोच का खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि जैसे कोई व्यक्ति अपने श्रम से जीविका कमाता है, वैसे ही ब्राह्मण भी पूजा-पाठ से कमाई करता है, जिसे धर्म कहना असल में एक भ्रम है।

समाज को आत्म-निर्भर बनाने की पहल

फुले का उद्देश्य समाज में बराबरी लाना था। उनका मानना था कि यदि शूद्र, दलित और पिछड़े वर्ग शिक्षा पाएंगे, तो वे इन ढकोसलों को समझ पाएंगे और आत्मनिर्भर बन सकेंगे। उन्होंने नारी शिक्षा, सत्य शोधक समाज की स्थापना और जातिवादी शिक्षण पद्धति का विरोध कर एक क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी।

आज भी प्रासंगिक है फुले का संदेश

वर्तमान समय में जब धार्मिक कर्मकांडों को व्यवसाय बनाकर पेश किया जा रहा है, तब फुले का यह कथन पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं हम अंधश्रद्धा, जातिवाद और झूठे पाखंडों में तो नहीं उलझे हुए हैं।

महात्मा फुले ने जो विचार रखे, वह किसी धर्म या व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं थे, बल्कि शोषण के ढांचे के विरोध में थे। उनका उद्देश्य था – बुद्धि का उपयोग करो, आत्म-सम्मान से जियो और शोषण का विरोध करो।

निष्कर्ष:

महात्मा ज्योतिबा फुले के विचार आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। यदि हम एक समतामूलक, न्यायप्रिय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें उनके विचारों को केवल याद नहीं, बल्कि जीवन में उतारना होगा।