गोला गोकर्णनाथ-
गोला कोटवारा जंगल में गर्मी शुरू होने के साथ ही जंगल धधक रहे हैं,जंगल में धधक रहे आग़ से कई तरह के खतरे भी हो सकते हैं,गर्मी पड़ने के साथ ही कोटवारा के जंगल सुलगने लगे हैं,आग़ की यह लपटे जितनी ही आसमान को छू रही हैं उतनी ही जमीन को खोखला कर रही हैं, वजूद को खत्म कर रही हैं। जंगल में धधकती आग़ से किसी के नुकसान होने की कोई खबर नहीं है, हालांकि कुछ लोगों को जंगलों में आग बुझाते भी देखा गया।
हर साल मध्य फरवरी से मध्य जून के बीच इन चार महीनो के अंतराल में जंगली जीव जंतुओं, पर्यावरण और समूची जैव विविधता को संकट में डालने वाला यह घटनाक्रम तमाम कोशिशें के बाद भी थमता नहीं दिखता।
कहा जाता है कि कुदरत को अगर चलते रहना है तो जरूरी है खास तौर से जंगल की आग़ के बारे में यही कहा जाता है,कि यह एक सालाना आयोजन के तहत लगे या लगाई जाने वाली आग़ नए सृजन का रास्ता खोलते हैं,ऐसा सदियों से होता आया है और आगे भी होता रहेगा,लेकिन समस्या तब है जब यह आग बेकाबू हो जाए और जीव जंतुओं व नजदीक बसी मानव आबादी के लिए काल बन जाए,इस कारण पैदा हुए धुएं के कारण आना जाना मुश्किल होने लगे और जंगल की बेशकीमती लकड़ी जलकर खाक हो जाए।
वन क्षेत्र में लगी आग को बुझाना आसान नहीं होता गर्मियों में सुखा मौसम रहता है,वहां आग लगती रहती है,गर्मियों में झाड़ियां और घास फूस सूखकर आंग़ के खतरे को और बढ़ा देते हैं।
जंगलों की साफ सफाई होने से आग़ के खतरे को कम किया जा सकता है।
संवाददाता – अनुज कुमार गुप्ता
लखीमपुर खीरी : गोला गोकर्णनाथ – जंगल जंगल आग लगी है….
