हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। इस पहल की शुरुआत मोहम्मद दिलावर जो नेचर फॉरएवर सोसाइटी के संस्थापक हैं, ने 20 मार्च 2010 को की थी। इसका उद्देश्य तेजी से लुप्त होती गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना था। गौरैया के संरक्षण के उद्देश्य से तत्कालीन दिल्ली सरकार ने 14 अगस्त 2012 में गौरैया को दिल्ली का राजकीय पक्षी घोषित किया और बाद में 2013 में बिहार सरकार ने भी गौरैया को अपना राज्य पक्षी घोषित किया।
गौरैया एक घरेलू पक्षी है जो मनुष्यों के साथ रहकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है। भारतीय संस्कृति, लोक कथाओं और आध्यात्मिक परंपराओं में इसका विशेष महत्व है। लोक मान्यताओं के अनुसार जिस घर में गौरैया अपना घोंसला बनाती है, उस घर के लिए इसे सौभाग्य, सुख-शांति और ईश्वर की कृपा का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से भारतीय संस्कृति में इसे घर में समृद्धि और तरक्की लाने वाला पक्षी माना गया है।
मुझे आज भी याद है कि मेरे बाबा सुबह सबसे पहले उठकर गौरैया के लिए दाना और पानी रखते थे। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम धीरे-धीरे इन पुरानी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। हमारे पूर्वज गाय, कुत्ते और गौरैया को अपने परिवार का सदस्य मानते थे। दुर्भाग्यवश आज के परिवेश में लोग कुत्तों को अपने घरों और समाज से हटाने के लिए न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाते हैं। ऐसे समाज से क्या उम्मीद की जा सकती है जहाँ लोग अकेले रहने के लिए अपने बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजना पसंद करते हैं। यदि वर्ष 2000 के आसपास जितनी गौरैया होती थीं उतनी आज भी होतीं, तो शायद कुछ लोग गंदगी फैलाने का बहाना बनाकर उन्हें हटाने के लिए भी न्यायालय चले जाते।
मैं यह भी बताना चाहूँगा कि लगभग सन 2000 के आसपास सुबह की शुरुआत गौरैया की चहचहाहट से होती थी, जो मानो प्राकृतिक “सुप्रभात” का संदेश देती थी, और शाम को उनकी हल्की-सी चहचहाहट से ही संध्या होने का आभास हो जाता था।
आज मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ बहुत अधिक फैल गई हैं। गौरैया इन समस्याओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह कीट-पतंगों और छोटे कीड़ों को खाती है। इससे पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है, जो पर्यावरण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
मैं कुछ भी लिखूँ और तिहाड़ जेल का उल्लेख न करूँ, ऐसा हो ही नहीं सकता। तिहाड़ जेल में हजारों की संख्या में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। यदि विशेष रूप से गौरैया की बात करें तो वे मंडोली जेल में काफी संख्या में मिलती हैं। इनके संरक्षण के लिए प्रशासन ने बंदियों के साथ मिलकर गौरैया संरक्षण की एक मुहिम शुरू की है।
तिहाड़ एक ऐसी सरकारी संस्था है जहाँ हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। बंदी भी इस अभियान से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इस पहल से हमें दो बड़े लाभ देखने को मिले—पहला, बंदियों की मानसिकता क्रूरता से करुणा की ओर बदलती हुई दिखाई दी, और दूसरा, गौरैया की संख्या में वृद्धि हुई। यह जेल प्रशासन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
अब समय आ गया है कि पर्यावरण को स्वस्थ बनाने के लिए हम सभी सरकार के साथ मिलकर लुप्त होती गौरैया के संरक्षण के लिए आगे आएँ और उन्हें फिर से अपने घरों का हिस्सा बनाएँ।
लेखक ✍️
योगेंद्र कुमार
सह अधीक्षक (तिहाड़ जेल)
पशु कल्याण प्रतिनिधि
भारतीय पशु कल्याण बोर्ड

