नई दिल्ली:थप्पड़ राजनीति एक ही घटना पर बदले बयान, बदल गया नैरेटिव

नई दिल्ली:(द दस्तक 24 न्यूज़)) 20 अगस्त 2025 भारतीय राजनीति में नेताओं पर हमले कोई नई बात नहीं है। कभी किसी रैली में, तो कभी रोड शो के दौरान नेता जनता के गुस्से या असामाजिक तत्वों की हरकत का शिकार हो जाते हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि एक ही घटना (थप्पड़ लगने) पर अलग-अलग राजनीतिक दलों का नैरेटिव पूरी तरह बदल जाता है।

केजरीवाल को थप्पड़ और बीजेपी का बयान

कुछ साल पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोड शो के दौरान एक शख्स ने थप्पड़ मारा था। उस वक्त बीजेपी नेताओं ने इस घटना को “जनता का गुस्सा” बताया था। उनका कहना था कि यह जनता के असंतोष का प्रतीक है, जिसे आम आदमी पार्टी को समझना चाहिए।

रेखा गुप्ता को थप्पड़ और बदल गया नैरेटिव

अब ताज़ा घटनाक्रम में बीजेपी नेता और संभावित मुख्यमंत्री चेहरा मानी जा रही रेखा गुप्ता को एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान थप्पड़ मारा गया। इस बार बीजेपी नेताओं का रुख बिल्कुल बदल गया। उन्होंने इसे “लोकतंत्र पर हमला” करार दिया और साजिश की बू तक बताई।

आखिर बदला क्यों नैरेटिव?

राजनीति में अक्सर घटनाओं को अपने हिसाब से पेश किया जाता है।

जब विरोधी दल का नेता निशाना बनता है, तो उसे जनता के गुस्से की संज्ञा दी जाती है।

और जब अपने दल का नेता हमला झेलता है, तो उसे लोकतंत्र पर हमला बताया जाता है।

यही वजह है कि एक ही घटना पर राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया साफ झलकता है।

सोशल मीडिया पर बहस

इस घटना ने सोशल मीडिया पर भी जमकर बहस छेड़ दी है।

आम आदमी पार्टी समर्थक कह रहे हैं कि बीजेपी का असली चेहरा सामने आ गया है।

वहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं का कहना है कि नेताओं पर हमला किसी भी सूरत में लोकतंत्र के खिलाफ है।

जनता के बीच यह चर्चा गरम है कि क्या नेताओं पर हमले को राजनीतिक रंग देना सही है या गलत।

लोकतंत्र के लिए खतरा या जनता की नाराज़गी?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नेता पर हमला लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। असहमति जताने का तरीका बहस, वोट और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं होनी चाहिए, हिंसा नहीं।

लेकिन राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे ऐसी घटनाओं पर एक समान मानक अपनाएं, न कि अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से बयान बदलें।

निष्कर्ष

“थप्पड़ वही है, लेकिन बयान अलग-अलग हैं” – यही मौजूदा राजनीति की असलियत है। लोकतंत्र की रक्षा तभी हो सकती है जब राजनीतिक दल हिंसा की हर घटना की निष्पक्ष निंदा करें और जनता के गुस्से को समझने के लिए संवेदनशील राजनीति करें।