मथुरा:गोवर्धन में मूर्ति स्थापना को लेकर उठा विवाद, समाज ने महात्मा फुले दंपत्ति की प्रतिमा लगाने की रखी मांग

मथुरा:(द दस्तक 24 न्यूज़) 09 सितंबर 2025 जनपद की गोवर्धन विधानसभा में इन दिनों चौराहों के नामकरण और मूर्ति स्थापना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। नगर के कई प्रमुख स्थानों पर महाराणा प्रताप, भगवान परशुराम जैसी ऐतिहासिक एवं धार्मिक हस्तियों की मूर्तियां लगाने की कवायद चल रही है। इसी क्रम में सैनी मोहल्ला दसवीसा ब्लॉक चौराहा पर भी एक नई मूर्ति स्थापना की योजना बनाई जा रही है।

राधा–कृष्ण प्रतिमा स्थापना पर समाज का विरोध

चेयरमैन कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस चौराहे पर राधा–कृष्ण की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। गोवर्धन धार्मिक नगरी होने के कारण यहां पहले से ही अनेक स्थानों पर भगवान राधा–कृष्ण की मूर्तियां स्थापित हैं। हालांकि, इस चौराहे को लेकर समाज के लोगों और युवाओं में असहमति सामने आई है।

स्थानीय सैनी, कुशवाहा, शाक्य, मौर्य और दलित समाज के लोग चेयरमैन कार्यालय पहुंचकर विरोध दर्ज करा चुके हैं। उनका कहना है कि यह चौराहा समाज बाहुल्य क्षेत्र में आता है और यहां पहले से ही महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई फुले के नाम का बोर्ड लगा हुआ है। इसलिए इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यहां महात्मा फुले दंपत्ति की प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए।

समाज की दलील –

‘सिर्फ मूर्ति नहीं, विचारों का प्रसार चाहते हैं’ युवाओं और सामाजिक जनों का कहना है कि वे किसी भी प्रतिमा या महापुरुष का विरोध नहीं करते। लेकिन उनका उद्देश्य है कि समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई फुले की प्रतिमाएं यहां स्थापित हों, ताकि उनके विचार – शिक्षा, समानता, न्याय और बंधुत्व – लोगों तक पहुंच सकें।

महात्मा फुले को भारत में सामाजिक क्रांति का अग्रदूत माना जाता है, वहीं माता सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में जानी जाती हैं।

चेयरमैन का रुख और संभावित आंदोलन

चेयरमैन साहब का स्पष्ट कहना है कि इस चौराहे पर राधा–कृष्ण की प्रतिमा ही लगाई जाएगी। वहीं, समाज का कहना है कि उनकी बार-बार की गई मांगों को उपेक्षित किया जा रहा है। इससे समाज के बीच गहरा आक्रोश व्याप्त है।

सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि शासन–प्रशासन इस विषय पर निष्पक्ष निर्णय नहीं लेता और महात्मा फुले दंपत्ति की प्रतिमा लगाने की अनुमति नहीं देता, तो वे जन आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

निष्कर्ष

गोवर्धन में यह विवाद केवल प्रतिमा स्थापना का नहीं है, बल्कि यह समाज के आत्मसम्मान और ऐतिहासिक महापुरुषों के योगदान को मान्यता दिलाने का सवाल बन गया है। अब देखना होगा कि शासन–प्रशासन धार्मिक नगरी की परंपरा और सामाजिक न्याय के इस टकराव में किस तरह संतुलन साधता है।