लखनऊ:(द दस्तक 24 न्यूज़) 11 अक्टूबर 2025 नवयुग कन्या महाविद्यालय, राजेंद्र नगर, लखनऊ के संस्कृत विभाग तथा ग्लोबल संस्कृत फोरम, लखनऊ मंडल के संयुक्त तत्वावधान में महर्षि वाल्मीकि जयंती के उपलक्ष्य में “रामायण में मानवीय मूल्य” विषय पर एक दिवसीय ई-राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन तरंग माध्यम के जरिए किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर मंजुला उपाध्याय ने की।
संगोष्ठी का शुभारंभ संयोजिका एवं सह-आचार्या डॉ. वंदना द्विवेदी द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर बलबहादुर त्रिपाठी, निदेशक, शोध पीठ, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी तथा विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. अभिमन्यु सिंह, अध्यक्ष, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय उपस्थित रहे।
अतिथि वक्ताओं का परिचय ग्लोबल संस्कृत फोरम लखनऊ मंडल की अध्यक्ष डॉ. उमा सिंह ने कराया।
“रामायण श्रेय और प्रेय दोनों का साधन” — प्रो. त्रिपाठी
मुख्य वक्ता प्रो. बलबहादुर त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि रामायण श्रेय और प्रेय दोनों का साधन है। इसमें धर्म को सर्वोपरि माना गया है। भगवान राम ने पिता के वचनों का पालन कर धर्म की सर्वोच्च स्थापना की। उन्होंने कहा कि राम के जन्म का संबंध यज्ञीय संस्कृति से है — ऋष्यश्रृंग द्वारा संपन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से चारों पुत्रों का जन्म हुआ था।
रामराज्य की अवधारणा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि “वर्तमान शासन व्यवस्था में भी रामराज्य के आदर्शों को साकार करने का प्रयास किया जा रहा है, किंतु यह तभी संभव है जब हम वाल्मीकि द्वारा रचित आदर्श महाकाव्य ‘रामायण’ के मूल्यों को आत्मसात करें।”
“राम के आचरण में ही मानवता की शिक्षा” — डॉ. अभिमन्यु सिंह
विशिष्ट वक्ता डॉ. अभिमन्यु सिंह ने कहा कि “राम की तरह आचरण करना ही सच्चे मानव का लक्षण है। रामायण में जो मानवीय मूल्य प्रतिपादित हैं — जैसे सत्य, धर्म, न्याय, करुणा, त्याग, समर्पण, गुरु एवं बड़े-बुजुर्गों का सम्मान — वे आज भी समाज को एकता और समानता के मार्ग पर ले जाने में सहायक हैं।”उन्होंने कहा कि रामायण का सर्वोच्च मूल्य सत्य के प्रति निष्ठा है — “राम के संपूर्ण जीवन में सत्य का निर्वाह एक प्रेरक उदाहरण है।”
अध्यक्षीय उद्बोधन
महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. मंजुला उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि रामायण के प्रत्येक पात्र से हमें जीवन मूल्य सीखने चाहिए। त्याग, न्याय, सेवा, नारी सम्मान, क्षमा, करुणा, भ्रातृ प्रेम जैसे गुण आज के समाज में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे।
संचालन और धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. वंदना द्विवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि भगवान राम का चरित्र स्वयं धर्म का साकार रूप है — “रामो विग्रहवान् धर्मः”।
कार्यक्रम में ग्लोबल संस्कृत फोरम के महासचिव डॉ. राजेश मिश्र, कार्यकारिणी सदस्य डॉ. रजनी सरीन, प्रो. ऋचा शुक्ला, डॉ. रेखा शुक्ला, रश्मि सिंह, महाविद्यालय के प्रवक्तागण, शोध छात्र-छात्राएं एवं अनेक संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे।
