लखनऊ:(द दस्तक 24 न्यूज़) 20 सितंबर 2025 भारतीय राजनीति में धर्म और जाति आधारित मुद्दे लंबे समय से विवाद का विषय बने हुए हैं। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है।
भाजपा की नीतियों पर विवाद
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अक्सर धर्म और संप्रदाय के मुद्दों को उभारकर राजनीतिक लाभ उठाती है।
संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 51 सभी नागरिकों को आपसी भाईचारा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का निर्देश देता है।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि भाजपा द्वारा हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों को राजनीतिक चर्चा में लाना सामाजिक सौहार्द और संविधान की भावना के विपरीत है।
“पीडीए” का अस्पष्ट संदेश
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव “पीडीए” (PDA) का नारा देते रहे हैं, लेकिन इसकी स्पष्ट व्याख्या आज तक सामने नहीं आई।
कभी “पी” का मतलब पिछड़ा तो कभी पंडित।
“डी” का अर्थ कभी दलित तो कभी डिंपल यादव।
“ए” को कभी अगड़ा, कभी आधी आबादी या अल्पसंख्यक बताया गया।
विश्लेषकों का कहना है कि इस अस्पष्टता के कारण पार्टी का संदेश जनता तक स्पष्ट नहीं पहुंच पा रहा है।
समाजवादी पार्टी की दिशा
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, समाजवादी पार्टी धीरे-धीरे अपने मूल समाजवादी सिद्धांतों और सामाजिक न्याय के एजेंडे से भटकती हुई दिखाई दे रही है।
पार्टी को पुनः अपने सिद्धांतों और मूल उद्देश्य की ओर लौटने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
संविधान सभी नागरिकों को समानता और भाईचारे का अधिकार देता है। ऐसे में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी बनती है कि वे धर्म, जाति या संप्रदाय के नाम पर विभाजन न फैलाएँ।
भाजपा पर लगे आरोप हों या समाजवादी पार्टी की दिशा पर सवाल—दोनों ही लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द के लिए महत्वपूर्ण चिंता का विषय हैं।
