‘120 बहादुर’ भारत-चीन युद्ध की एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है। इसका उद्देश्य उन सैनिकों को सम्मान देना है जिन्होंने 1962 में बेहद मुश्किल हालात में लड़ाई लड़ी। शुरुआत से ही महसूस होता है कि मेकर्स की नीयत मजबूत है, लेकिन भावनात्मक और सिनेमाई स्तर पर फिल्म पूरी पकड़ नहीं बना पाती।
फिल्म का निर्माण एक्सेल एंटरटेनमेंट और ट्रिगर हैप्पी स्टूडियोज ने किया है। मुख्य किरदार मेजर शैतान सिंह भाटी (फरहान अख्तर) हैं, जो सिर्फ 120 सैनिकों के साथ रेज़ांग ला पोस्ट को संभालते हैं। उस समय लगभग 3000 चीनी सैनिक इस पोस्ट को कब्जे में लेने की कोशिश करते हैं। फिल्म दिखाती है कि कम साधनों, कठिन मौसम और लगातार दबाव के बीच भारतीय सैनिकों ने कैसे डटे रहे। मेजर शैतान सिंह की सूझबूझ और नेतृत्व को जगह दी गई है। प्लॉट मजबूत है, लेकिन कई जगह भावना उतनी गहराई तक नहीं पहुंचती। कई जगह ऐसा भी लगता है कि डायलॉग उतना असर नहीं छोड़ते। उन्हें सुनकर गहरी देशभक्ति महसूस नहीं होती, शायद इसका कारण यह भी है कि ऐसी युद्ध फिल्मों का फ्लो हम पहले बहुत बार देख चुके हैं।
फरहान अख्तर लगभग चार साल बाद बड़े पर्दे पर लौटे हैं। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ठीक लगती है, लेकिन कई अहम सीन में इमोशन पूरी तरह महसूस नहीं होते। उनके चेहरे पर थकान नजर आती है, जो मेजर शैतान सिंह के किरदार से मेल नहीं खाती। डायलॉग डिलीवरी भी कमजोर लगती है।
राशि खन्ना सीमित समय के लिए दिखाई देती हैं और अपना काम सही करती हैं, लेकिन उनके और फरहान के बीच भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाता। विवान भतेना (जमादार सूरजा राम) अपनी दमदार आवाज और डायलॉग डिलीवरी से अलग दिखते हैं। एजाज खान कमांडिंग ऑफिसर के रूप में भरोसेमंद लगते हैं। स्पर्श वालिया, अंकित सिवाच, दिग्विजय प्रताप, देवेंद्र अहिरवार और फ्रेडी चान जैसे कलाकारों ने मिलकर सैनिकों का माहौल असली रखने की कोशिश की है।
फिल्म का निर्देशन रजनीश ‘रेजी’ घोष ने किया है। उनकी सोच साफ दिखाई देती है कि कहानी को बड़े स्केल और भावनात्मक तरीके से पेश किया जाए। कुछ सीन सही लगते हैं, लेकिन निर्देशन लगातार प्रभाव नहीं छोड़ता। कई जगह भावनाएं महसूस होने के बजाय समझाई जाती हैं। ऐसा भी लगता है कि फिल्म ‘बॉर्डर’ जैसी फील देने की कोशिश करती है, लेकिन उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती।
स्क्रीनप्ले अस्थिर महसूस होता है। कभी कहानी तेज होती है, तो कभी धीमी। शुरुआती हिस्सा पहले देखी हुई युद्ध फिल्मों जैसा लगता है। सैनिकों के बीच बातचीत और मेजर-ऑफिसर की बहस ठीक है, लेकिन असरदार नहीं बन पाती। कई किरदारों की बैकस्टोरी अचानक दिखाई जाती है, जिससे कहानी का फ्लो टूट जाता है। एडिटिंग भी कई जगह जल्दबाजी दिखाती है, जिससे कुछ सीन अपना असर खो देते हैं।
कुछ एक्शन सीन ठीक बने हैं और थोड़ी टेंशन भी महसूस होती है, लेकिन VFX हर बार असली नहीं लगता। कई जगह साफ नजर आता है कि यह शूट किया गया सेट है। युद्ध जैसी घबराहट या डर लगातार महसूस नहीं होता।
